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The Haryana Story | पानीपत का 'महा-समीकरण': निगम से संसद तक सत्ता के शिखर पर जिला, फिर विकास के लिए तरसती जनता क्यों ना पूछे सवाल?

पानीपत का 'महा-समीकरण': निगम से संसद तक सत्ता के शिखर पर जिला, फिर विकास के लिए तरसती जनता क्यों ना पूछे सवाल?

'अब नहीं तो कब?' इतिहास के सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ के बावजूद बुनियादी समस्याओं से जूझता पानीपत, मेयर, 4 विधायक जिनमें 2 मंत्री, राज्यसभा सांसद, लोकसभा सांसद और प्रदेशाध्यक्ष...फिर भी पानीपत जाम और गंदगी से बेहाल!

पानीपत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि नगर निगम से लेकर देश की संसद तक, सत्ता के सारे सूत्र सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों में हैं, इसलिए यह पानीपत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दौर है। जिले की चारों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है, राज्य सरकार में दो कैबिनेट मंत्री पानीपत से हैं, नवनियुक्त भाजपा प्रदेशाध्यक्ष भी इसी धरती से हैं, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर करनाल लोकसभा से सांसद हैं, पानीपत जिला करनाल लोकसभा क्षेत्र में आता है, राज्यसभा सांसद और नगर निगम की मेयर भी इसी दल से हैं।

जब शासन, प्रशासन और संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे तमाम अधिकारी और नेता एक ही विचारधारा के हों, तो विकास की रफ्तार 'बुलेट ट्रेन' जैसी होनी चाहिए। आज पानीपत के पास वह राजनीतिक ताकत है, जो हरियाणा के किसी अन्य जिले के पास शायद ही हो, लेकिन धरातल पर पानीपत की जनता आज भी बुनियादी समस्याओं के लिए संघर्ष कर रही है, जो वास्तव में एक अत्यंत दुखद और विचारणीय विषय है। 

राजनीतिक शक्ति का अभूतपूर्व केंद्र: आंकड़े और तथ्य

पानीपत की जनता ने सत्ताधारी दल पर जो भरोसा जताया है, उसकी ताकत को इन राजनीतिक पदों से समझा जा सकता है। 4 विधायक और 2 कैबिनेट मंत्री यानी पानीपत ग्रामीण से महिपाल ढांडा (स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और संसदीय कार्य मंत्री) और इसराना से कृष्ण लाल पंवार (विकास एवं पंचायत और खान एवं भूविज्ञान मंत्री) कैबिनेट का हिस्सा हैं। वहीं पानीपत शहरी सीट से प्रमोद कुमार विज विधायक हैं। समालखा से मनमोहन भड़ाना भी भाजपा से हैं। वहीं भाजपा की नवनियुक्त हरियाणा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता भी पानीपत से ही ताल्लुक रखती हैं। इसके साथ ही पूर्व लोकसभा सांसद संजय भाटिया अब राज्यसभा में पानीपत और हरियाणा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर करनाल लोकसभा से सांसद हैं, पानीपत जिला करनाल लोकसभा क्षेत्र में आता है, स्थानीय सरकार (नगर निगम) की कमान भी भाजपा की मेयर के पास है, जिससे प्रशासनिक समन्वय की कोई कमी नहीं रह जाती।

जब सब कुछ 'अपना' है, तो बहानेबाज़ी कैसी?

अक्सर नेता और प्रशासनिक अधिकारी विकास कार्यों में देरी के लिए 'विपक्ष की रुकावटें' या 'फंड और तालमेल की कमी' का बहाना बनाते हैं। लेकिन इतने ताकतवर प्रतिनिधित्व के बावजूद, आज पानीपत की जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। जब सरकार, संगठन, सांसद, विधायक, मेयर और अधिकारी सब एक ही रंग में रंगे हैं, तो विकास कार्यों में देरी के लिए कोई भी बहानेबाज़ी या विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।  चूंकि सूबे में भाजपा की सरकार है, इसलिए जिले के आला प्रशासनिक अधिकारी और नगर निगम के कमिश्नर सीधे इन्हीं मंत्रियों और नेताओं के प्रति जवाबदेह हैं। कुल मिलाकर केंद्र में भाजपा, राज्य में भाजपा और स्थानीय नगर निगम में भी भाजपा। ऐसे में विकास योजनाओं की फाइलें अटकने का कोई कारण नहीं बचता।

जनता के चुभते सवाल - बुनियादी मुद्दों पर 'अंडर-डेवलपमेंट' क्यों?

'टेक्सटाइल सिटी' और 'बुनकर नगरी' के नाम से वैश्विक पहचान रखने वाला पानीपत आज स्थानीय स्तर पर कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, जिन पर जनता अब सीधे सवाल उठा रही है। पानीपत आज प्रशासनिक उपेक्षा और बदहाली का शिकार है। शहर के पॉश इलाकों से लेकर औद्योगिक क्षेत्रों तक की सड़कें पूरी तरह ध्वस्त हैं।

प्रदूषण और ड्रेनेज की बदहाली: पानीपत के औद्योगिक वेस्ट और केमिकल युक्त पानी की निकासी की व्यवस्था आज भी लचर है। बारिश के दिनों में सड़कों का तालाब बन जाना आम बात है।

सड़कों और ट्रैफिक की दुर्दशा: नेशनल हाईवे के किनारे बसे होने के बावजूद, शहर के आंतरिक हिस्सों और ग्रामीण इलाकों की सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं। डंपिंग यार्ड और कचरा प्रबंधन (कूडा निस्तारण) की समस्या जस की तस बनी हुई है।

अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार: आम जनता का आरोप है कि इतने बड़े नेताओं के पानीपत से होने के बावजूद, स्थानीय सरकारी दफ्तरों में बिना 'सिफारिश' या परेशानी के काम नहीं होते। अधिकारी जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनहीन बने हुए हैं।

नेशनल हाईवे (NH-44) के साथ लगती पेरीफेरल सड़कों की चौड़ाई और ड्रेनेज सिस्टम ठीक न होने के कारण शहर को रोजाना भीषण ट्रैफिक जाम से जूझना पड़ता है। इसके अलावा रिहायशी और कमर्शियल इलाकों में बेलगाम अतिक्रमण ने सड़कों को सिकोड़ दिया है।

'अब नहीं तो फिर कभी नहीं'

पानीपत को सत्ता के शिखर पर देख अब ज़ेहन में ये विचार आना स्वभाविक है कि "अगर इस स्वर्ण काल में भी पानीपत का कायाकल्प नहीं हो सका, तो फिर कभी नहीं हो सकता।" जनता ने अपनी तरफ से राजनीतिक शक्ति का पूरा 'क्रेडिट' भाजपा की झोली में डाल दिया है।

जनता का सवाल...अब जिम्मेदारी किसकी?

पानीपत की जनता ने इस उम्मीद में भाजपा को एकतरफा भारी जनादेश दिया था कि "डबल-इंजन" नहीं, बल्कि यह "मल्टीपल-इंजन" सरकार शहर की तकदीर बदलेगी। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि जनता बुनियादी सुविधाओं जैसे साफ पानी, पक्की सड़क, और साफ हवा के लिए भी तरस रही है। यदि मेयर 4 विधायक, 2 कैबिनेट मंत्री, प्रदेशाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद मिलकर भी पानीपत नगर निगम के अधिकारियों से ठीक से काम नहीं करवा पा रहे हैं या शहर को जाम और गंदगी से मुक्ति नहीं दिला पा रहे हैं, तो यह पानीपत की जनता के साथ बड़ा विश्वासघात है।

पानीपत के पास खुद को एक आधुनिक और विश्व स्तरीय औद्योगिक शहर के रूप में विकसित करने का यह आखिरी और सबसे सुनहरा मौका है। अगर इस 'महा-गठबंधन' के दौर में भी पानीपत की गलियां सीवर के पानी में डूबी रहीं और सड़कें गड्ढों में तब्दील रहीं, तो आने वाली पीढ़ियां इस राजनीतिक नेतृत्व को कभी माफ नहीं करेंगी। अब बहानों का वक्त खत्म हो चुका है, धरातल पर काम दिखाने का वक्त है।

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