वीर हरफूल सिंह जाट जुलानी वाला (1892 - 27 जुलाई 1936) हरियाणा के इतिहास के एक ऐसे महान योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी और अद्वितीय गौ-रक्षक थे, जिन्हें उनकी अटूट बहादुरी के कारण "सवा शेर" और "उत्तर भारत का रॉबिनहुड" कहा जाता है। उन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत की, बल्कि अकेले दम पर कई बूचड़खानों को बंद करवाकर हजारों गायों की जान बचाई। 27 जुलाई 1936 को उन्हें फिरोजपुर जेल में अंग्रेजों द्वारा फांसी दे दी गई थी।
वीर हरफूल सिंह जाट जुलानी: 'सवा शेर' गौरक्षक और क्रांतिकारी का संपूर्ण इतिहास
वीर हरफूल सिंह शेओरान का जन्म सन 1892 में हरियाणा के भिवानी जिले के बारवास गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया था। बाद में उनका जुड़ाव जींद जिले के जुलानी गांव से गहरा हो गया, जिसके कारण वे लोक-इतिहास में 'हरफूल जाट जुलानी वाला' के नाम से अमर हो गए। वे कद-काठी से बेहद सुदृढ़, निडर और निशानेबाजी में माहिर थे।
ब्रिटिश सेना में शामिल होना और युद्ध कौशल सीखना
देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को भांपते हुए हरफूल सिंह ने युद्ध कला सीखने के उद्देश्य से ब्रिटिश सेना ज्वाइन की थी। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में भी भाग लिया और सेना में रहते हुए बेहतरीन गुरिल्ला युद्ध और हथियार चलाने की ट्रेनिंग हासिल की। सेना की नौकरी के दौरान उन्होंने एक ब्रिटिश कर्नल के बच्चों की जान बचाई थी, जिससे खुश होकर सेवानिवृत्ति के समय उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक फोल्डिंग गन दी गई थी, जो बाद में उनके अभियानों का मुख्य हथियार बनी।
'सवा शेर' की उपाधि और टोहाना बूचड़खाना विध्वंस
ब्रिटिश राज (1930) के दौरान भारत में कई स्थानों पर सरकारी संरक्षण में बड़े पैमाने पर गायों के बूचड़खाने चलाए जा रहे थे, जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे थे। 23 जुलाई 1930 को हरफूल सिंह ने अकेले ही फतेहाबाद जिले के टोहाना बूचड़खाने पर हमला करने की योजना बनाई। कसाइयों की कड़ी सुरक्षा को भेदने के लिए उन्होंने महिला का भेष धारण किया और अंदर घुस गए। उन्होंने वहां मौजूद क्रूर कसाइयों को अपनी बंदूक से ढेर कर दिया और कटने के लिए कतार में खड़ी सैकड़ों गायों को हमेशा के लिए मुक्त करा दिया। इस अदम्य साहस को देखकर 52 गांवों की नैन खाप ने उन्हें जनता के सामने 'सवा शेर' की ऐतिहासिक उपाधि से नवाजा था।
लगातार 17 बूचड़खानों को किया जमींदोज
टोहाना की घटना के बाद हरफूल सिंह रुके नहीं। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के कानूनों को चुनौती देते हुए हरियाणा के विभिन्न जिलों में घूम-घूमकर गो-तस्करी और गौ-हत्या के खिलाफ जंग छेड़ दी। ऐतिहासिक साक्ष्यों और लोक-कथाओं के अनुसार, उन्होंने जींद, नरवाना, रोहतक और गोहाना समेत लगभग 17 बड़े बूचड़खानों को पूरी तरह नष्ट कर दिया और हजारों बेजुबान गायों को कसाइयों के चंगुल से छुड़ाया।
गरीबों के मसीहा और 'चलता-फिरता न्यायालय'
हरफूल जाट केवल एक गौरक्षक ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रतीक थे। वे अंग्रेजी अधिकारियों और भ्रष्ट जमींदारों द्वारा सताए गए गरीबों, किसानों और महिलाओं की ढाल बनते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे ऑन-द-स्पॉट इंसाफ करते थे, जिसके कारण आम जनता उन्हें 'चलता-फिरता न्यायालय' यानि Mobile Court कहती थी। वे अक्सर अमीरों और अत्याचारियों को लूटकर धन गरीबों में बांट दिया करते थे।
गिरफ्तारी और विश्वासघात
हरफूल सिंह की बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए भारी इनाम की घोषणा की थी। वे काफी समय तक अंडर ग्राउंड रहकर संघर्ष करते रहे। एक बार जब वे राजस्थान के झुंझुनू जिले के पचेरी कलां गांव में अपनी मुंहबोली बहन के यहां रुके हुए थे, तब एक मुखबिर ने इनाम के लालच में पुलिस को उनके वहां होने की गुप्त सूचना दे दी। रात के समय जब वीर हरफूल सो रहे थे, तब भारी पुलिस बल ने उन्हें चारों तरफ से घेरकर धोखे से गिरफ्तार कर लिया।
गुपचुप तरीके से फांसी दी गई
गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने उन पर मुकदमा चलाया और उन्हें पंजाब की फिरोजपुर सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेजों को डर था कि यदि हरफूल को आम सजा दी गई तो हरियाणा-पंजाब की जनता विद्रोह कर देगी। आखिरकार, 27 जुलाई 1936 को इस महान देशभक्त और गौरक्षक को फिरोजपुर जेल में गुपचुप तरीके से फांसी दे दी गई। अंग्रेज हुकूमत इस कदर खौफजदा थी कि फांसी के बाद जन-विद्रोह के डर से उन्होंने हरफूल सिंह का पार्थिव शरीर उनके परिवार को नहीं सौंपा और उनके शव को सतलुज नदी में प्रवाहित कर दिया।
सांस्कृतिक प्रभाव और विरासत
आज भी हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोक गीतों, सांग और आल्हा में वीर हरफूल सिंह जाट जुलानी की वीरता के किस्से बड़े चाव से गाए जाते हैं। प्रतिवर्ष 27-28 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि को उत्तर भारत के कई हिस्सों में 'गौरक्षक दिवस' या 'बलिदान दिवस' के रूप में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वे भारतीय इतिहास के पन्नों में हमेशा एक ऐसे वीर योद्धा रहेंगे जिन्होंने धर्म, संस्कृति और बेजुबानों की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
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