सिरसा की सांसद एवं कांग्रेस महासचिव कुमारी सैलजा ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की मौजूदा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि दो वर्षों में करीब 73 लाख किसानों का योजना से बाहर होना इस बात का संकेत है कि किसानों का फसल बीमा व्यवस्था से भरोसा कमजोर हुआ है। सैलजा ने कहा कि किसान अपनी मेहनत की कमाई से फसल का बीमा करवाता है और प्रीमियम भी जमा करता है, लेकिन प्राकृतिक आपदा से फसल बर्बाद होने के बाद उसे मुआवजे के लिए सर्वे, क्षेत्र की औसत उपज और तकनीकी नियमों के बीच उलझना पड़ता है।
योजना की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक
उन्होंने कहा कि फसल बीमा योजना का उद्देश्य किसान को प्राकृतिक आपदा से हुए आर्थिक नुकसान से सुरक्षा देना है, लेकिन वास्तविक नुकसान और मिलने वाले मुआवजे में बड़ा अंतर हो तो योजना की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि जिस खेत और फसल के आधार पर किसान का बीमा किया जाता है, नुकसान का आकलन करते समय भी उसी खेत की वास्तविक स्थिति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। किसान की बर्बाद फसल का आकलन केवल आंकड़ों और औसत उपज के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। जिस किसान को जितना वास्तविक नुकसान हुआ है, उसे उसी के अनुरूप समयबद्ध मुआवजा मिलना चाहिए।
व्यक्तिगत खेत के नुकसान का हो पारदर्शी आकलन
सैलजा ने कहा कि जब बीमा किसान द्वारा बोए गए क्षेत्र और फसल के आधार पर किया जाता है तथा बीमित राशि भी क्षेत्रफल के हिसाब से तय होती है, तो नुकसान के समय व्यक्तिगत खेत की वास्तविक स्थिति को पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि एक ही गांव में अलग-अलग खेतों में प्राकृतिक आपदा का असर अलग हो सकता है। ऐसे में पूरे क्षेत्र की औसत उपज के आधार पर मुआवजा तय करना कई किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने मांग की कि सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें सैटेलाइट तकनीक, डिजिटल सर्वे और मौके पर जांच के जरिए वास्तविक नुकसान का आकलन किया जाए। किसान को यह भी स्पष्ट जानकारी दी जाए कि उसके खेत का कितना बीमा हुआ है, बीमित राशि कितनी है, नुकसान का आकलन किस आधार पर किया गया और दावा कम या खारिज करने की स्थिति में उसका स्पष्ट कारण क्या है।
प्रत्येक किसान को मिले बीमा पॉलिसी की प्रति
कांग्रेस नेता ने कहा कि बीमा कंपनियों को प्रत्येक किसान को उसकी पॉलिसी की प्रति उपलब्ध करानी चाहिए। इसमें बीमित खेत और फसल का विवरण, बीमित राशि, प्रीमियम तथा दावा तय करने से संबंधित शर्तें स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसान से प्रीमियम समय पर लिया जाता है तो नुकसान होने के बाद सर्वे और मुआवजे की प्रक्रिया भी तय समयसीमा में पूरी होनी चाहिए। सर्वे प्रक्रिया में किसान की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ पूरी व्यवस्था पारदर्शी बनाई जानी चाहिए।
‘बीमा कंपनियों के हित से अधिक किसानों की चिंता करे सरकार’
सैलजा ने केंद्र और प्रदेश सरकार से फसल बीमा योजना की समीक्षा करने की मांग की। उन्होंने कहा कि फसल बीमा किसान की आर्थिक सुरक्षा का माध्यम होना चाहिए, न कि बीमा कंपनियों के लाभ का जरिया। उन्होंने कहा कि किसान ने जितना वास्तविक नुकसान झेला है, उसके अनुरूप समय पर मुआवजा मिलना ही वास्तविक किसान हित है।
महंगाई पर भी सरकार को घेरा
सैलजा ने बढ़ती महंगाई को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि चीनी, प्याज और रोजमर्रा की सब्जियों के बढ़ते दामों का सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है। सीमित आमदनी में घर चलाने वाले परिवारों का रसोई बजट लगातार प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि महंगाई को केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम परिवार की रसोई के हालात से समझना चाहिए। सरकार को ऐसी संतुलित नीति बनानी चाहिए, जिसमें किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को भी खाद्य सामग्री उचित दाम पर उपलब्ध हो। सैलजा ने कहा कि जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर सख्ती के साथ सरकार को किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। किसान की जेब सुरक्षित रहे और गरीब की थाली पर महंगाई का बोझ न बढ़े, यह सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
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