भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को लेकर अब संगठन के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। ISRO के अलग-अलग केंद्रों से जुड़े 9 कर्मचारी संगठनों ने चेयरमैन एवं अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन को पत्र लिखकर स्पेस सेक्टर में निजीकरण की दिशा और ISRO की भविष्य की भूमिका पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। यह पत्र 4 सितंबर को भेजा गया था और इसकी जानकारी 6 सितंबर को सामने आई। कर्मचारी संगठनों का मुख्य सवाल है कि यदि रॉकेट और सैटेलाइट के निर्माण तथा दूसरी ऑपरेशनल गतिविधियां निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों को दी जाती हैं, तो आने वाले वर्षों में ISRO की वास्तविक भूमिका क्या रह जाएगी? संगठनों ने कर्मचारियों की नौकरी, भविष्य की भर्ती, पदोन्नति और ISRO की तकनीकी क्षमता पर भी चिंता जताई है।
9 संगठनों ने क्यों उठाए सवाल?
रिपोर्टों के मुताबिक, पत्र पर Indian Space Research Organisation के प्रमुख केंद्रों से जुड़े कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर हैं। इनमें विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC), सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC), यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC), लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (LPSC), स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (SAC), नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) और ISRO प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स (IPRC) जैसे केंद्रों से जुड़े संगठन शामिल हैं। इन संगठनों का प्रतिनिधित्व करीब 5,000 कर्मचारियों का बताया गया है, जो ISRO की करीब 18,100 की स्वीकृत कार्यबल संख्या का लगभग 27 फीसदी है। कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि वे निजी कंपनियों के अंतरिक्ष क्षेत्र में आने के खिलाफ नहीं हैं। उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि निजी भागीदारी और ISRO की मूल तकनीकी एवं निर्माण क्षमता को कमजोर करने के बीच स्पष्ट सीमा तय होनी चाहिए।
रॉकेट निर्माण को लेकर सबसे बड़ा सवाल विवाद
उस समय तेज हुआ जब IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका की हालिया टिप्पणी को लेकर चर्चा शुरू हुई। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने संकेत दिया था कि भविष्य में ISRO द्वारा लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं किया जाएगा और यह काम निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जा सकता है। इसी के बाद कर्मचारी संगठनों ने पूछा कि PSLV, LVM3 और SSLV जैसे लॉन्च व्हीकलों के डिजाइन, निर्माण, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और लॉन्चिंग में ISRO की भूमिका भविष्य में कितनी रहेगी? कर्मचारियों का तर्क है कि ये काम केवल सामान्य मैन्युफैक्चरिंग नहीं हैं, बल्कि ISRO की वर्षों में विकसित हुई तकनीकी विशेषज्ञता, संस्थागत अनुभव और रणनीतिक क्षमता का हिस्सा हैं।
कर्मचारियों को नौकरी और भर्ती की भी चिंता
कर्मचारी संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि ISRO के मौजूदा काम लगातार निजी कंपनियों को हस्तांतरित होते गए तो संगठन के भीतर काम का दायरा घट सकता है। इसका असर नई भर्तियों, पदोन्नति, कौशल विकास और मौजूदा कर्मचारियों की भूमिका पर पड़ने की आशंका जताई गई है। कुछ कर्मचारियों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि वही काम निजी कंपनियां करने लगेंगी तो ISRO के मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य में भर्ती होने वाले युवाओं के लिए अवसर कितने बचेंगे। यही वजह है कि कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि किसी बड़े बदलाव को लागू करने से पहले Department of Space और मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के बीच औपचारिक बातचीत हो।
सरकार की नीति क्या है?
भारत ने 2020 से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। उद्देश्य निजी कंपनियों को रॉकेट, सैटेलाइट, लॉन्च सेवाओं और अंतरिक्ष आधारित अनुप्रयोगों में अधिक अवसर देना है। इसके लिए IN-SPACe जैसी संस्थागत व्यवस्था बनाई गई है, जबकि NewSpace India Limited (NSIL) ISRO की वाणिज्यिक शाखा के रूप में काम करती है।
सरकार का तर्क रहा है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी से भारतीय स्पेस इकोनॉमी का विस्तार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है। इसलिए मौजूदा विवाद को सीधे तौर पर "ISRO बंद होगा या नहीं" के रूप में देखना सही नहीं होगा। असली बहस यह है कि भविष्य में ISRO रिसर्च और अत्याधुनिक तकनीक तक सीमित रहेगा या लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट के निर्माण तथा संचालन में भी उसकी मौजूदा भूमिका बरकरार रहेगी। कर्मचारी इसी बिंदु पर स्पष्ट नीति चाहते हैं।
कांग्रेस ने भी सरकार पर साधा निशाना
कर्मचारी संगठनों की चिट्ठी सामने आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि स्टार्टअप और निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के नाम पर ISRO की भूमिका को जानबूझकर सीमित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ISRO की क्षमताएं दशकों की मेहनत से तैयार हुई हैं और उन्हें कमजोर करना देश के रणनीतिक हितों के लिए चिंता का विषय है। रमेश ने विशेष रूप से विक्रम साराभाई और सतीश धवन सहित उन वैज्ञानिकों की विरासत का उल्लेख किया, जिन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव मजबूत की। उनका आरोप है कि इस विरासत को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है।
GSLV की सफलता के बाद उठे सवाल
खास बात यह है कि कर्मचारी संगठनों का पत्र 4 सितंबर को GSLV-F17/EOS-05 मिशन की सफल लॉन्चिंग के तुरंत बाद सामने आया। ISRO ने इस मिशन के जरिए 2,367 किलोग्राम वजनी EOS-05 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में पहुंचाया। कांग्रेस ने भी मिशन की सफलता पर ISRO वैज्ञानिकों को बधाई दी, लेकिन साथ ही संगठन की भविष्य की भूमिका को लेकर सरकार पर निशाना साधा।
असली सवाल: निजी स्पेस इंडस्ट्री मजबूत हो या ISRO?
इस पूरे विवाद का केंद्र निजी कंपनियों का प्रवेश नहीं, बल्कि ISRO और निजी क्षेत्र के बीच जिम्मेदारियों का भविष्य का बंटवारा है। कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि निजी कंपनियां अंतरिक्ष क्षेत्र में आगे बढ़ें, लेकिन ऐसा करते समय ISRO की मूल तकनीकी क्षमता, अनुभवी वैज्ञानिक-इंजीनियरिंग कार्यबल, रणनीतिक स्वायत्तता और देश में विकसित विशेषज्ञता कमजोर न हो। फिलहाल 9 कर्मचारी संगठनों की चिट्ठी ने सरकार और ISRO प्रबंधन के सामने यह बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि भारत की अंतरिक्ष शक्ति का भविष्य निजी हाथों में कितना और ISRO के संस्थागत ढांचे में कितना होगा। इस पर अब स्पष्ट आधिकारिक जवाब का इंतजार है।
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