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The Haryana Story | अटल @100: वह राष्ट्रपुरुष, जिसे भारत को स्मरण करना चाहिए

अटल @100: वह राष्ट्रपुरुष, जिसे भारत को स्मरण करना चाहिए

राज्यसभा सांसद सुभाष बराला द्वारा प्रस्तुत

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी; राज्यसभा सांसद सुभाष बराला

“हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पर

लिखता मिटाता हूँ।” 

— अटल बिहारी वाजपेयी

भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्म शताब्दी केवल स्मरण का अवसर नहीं है। यह राष्ट्र के लिए एक ठहराव का क्षण है, जब हम उस नेतृत्व शैली पर विचार करते हैं जिसमें नैतिक साहस और राजनीतिक संयम, निर्णायक शासन और लोकतांत्रिक गरिमा, तथा वैचारिक दृढ़ता के साथ मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

25 दिसंबर 2024 से 25 दिसंबर 2025 तक देश अटल बिहारी वाजपेयी जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा है। यह वर्ष केवल अतीत का उत्सव नहीं है, बल्कि उन मूल्यों की पुनः पुष्टि का अवसर है जिन्होंने आधुनिक भारत को आकार दिया और जो आज भी हमारे भविष्य का मार्गदर्शन कर रहे हैं। अटल जी की विरासत इतिहास तक सीमित नहीं है। वह हमारे संस्थानों में, हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं में और विशेष रूप से हरियाणा जैसे राज्यों की शासन पद्धति में जीवित है।

अटल जी का हरियाणा से विशेष और आत्मीय संबंध रहा है। वे अक्सर राष्ट्र के प्रति हरियाणा के अद्वितीय योगदान का उल्लेख करते थे, विशेषकर सैनिकों और किसानों के संदर्भ में। उनका प्रसिद्ध नारा “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” हरियाणा में गहराई से प्रतिध्वनित होता है। यह वह भूमि है जिसने देश को वीर जवान दिए हैं और अन्नदाता किसानों के माध्यम से देश की खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ किया है, साथ ही विज्ञान और तकनीक को विकास का माध्यम बनाया है।

अटल जी उस पीढ़ी के नेता थे जो राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा मानते थे। उनका जीवन ईमानदारी, बौद्धिक गहराई और लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट विश्वास से परिभाषित था। एक सशक्त विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद, वे असहमति, संवाद और संसदीय मर्यादाओं का पूरा सम्मान करते थे। बढ़ते ध्रुवीकरण के इस दौर में उनका आचरण यह सिखाता है कि मतभेद कभी भी वैमनस्य में नहीं बदलने चाहिए।

प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी ने यह सिद्ध किया कि दृढ़ता और करुणा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान स्थापित की, परंतु सदैव उत्तरदायित्व और नैतिकता के साथ। पोखरण परमाणु परीक्षण रणनीतिक संकल्प का प्रतीक थे, तो शांति के लिए उनके प्रयास सच्चे राष्ट्रपुरुष के परिचायक थे। उनका विश्वास था कि भारत को सशक्त भी होना चाहिए और विवेकशील भी। 

सुशासन उनकी राजनीति का मूल आधार था। अटल जी के लिए शासन का अर्थ नियंत्रण नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और प्रभावी क्रियान्वयन था। यही कारण है कि उनका जन्मदिवस 25 दिसंबर आज सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। हरियाणा में यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है।

आज भी हरियाणा में शासन और प्रशासन की दिशा तय करते समय अटल जी के विचारों और भाषणों को प्रेरणा के स्रोत के रूप में देखा जाता है। पारदर्शिता, डिजिटल शासन, किसान कल्याण, आधारभूत ढांचे का विस्तार और अंतिम पंक्ति तक सेवा पहुँचाने का संकल्प अटल जी के सुशासन दर्शन की निरंतरता को दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि उनके विचार किसी एक समय या सरकार तक सीमित नहीं थे, बल्कि शाश्वत शासन सिद्धांत थे।

विकास के प्रति उनका दृष्टिकोण भी समावेशी था। सड़कें, संचार और तकनीक उनके लिए केवल परियोजनाएँ नहीं थीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक एकीकरण के साधन थीं। हरियाणा में संतुलित विकास पर दिया जा रहा बल इसी सोच का प्रतिबिंब है, जहाँ गांवों को बाजारों, अवसरों और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है। 

नीतियों और शासन से परे, अटल जी का सबसे बड़ा योगदान भारत को एक सभ्यतागत लोकतंत्र के रूप में समझना था। वे मानते थे कि भारत की शक्ति उसकी विविधता, संवाद की क्षमता और मतभेदों के बीच भी एकता बनाए रखने में है। उनका राष्ट्रवाद आत्मविश्वासी था, परंतु कभी बहिष्करणकारी नहीं; दृढ़ था, परंतु संवेदनशील भी।

जन्म शताब्दी वर्ष विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। अटल जी का जीवन सिखाता है कि नेतृत्व शोर से नहीं, दृष्टि से पहचाना जाता है; टकराव से नहीं, सहमति से मजबूत होता है; और सत्ता से नहीं, उद्देश्य से परिभाषित होता है। उनका जीवन सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व और विनम्रता का स्मरण कराता है।

आज जब भारत आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, अटल जी के विचार और आदर्श हमारे मार्ग को निरंतर प्रकाशित कर रहे हैं। सुशासन, राष्ट्रीय एकता और नैतिक नेतृत्व में उनका विश्वास आज भी हरियाणा सहित पूरे देश में जीवंत है।

“दीप जलाएँ, आगे बढ़ें,

अंधियारे से लड़ते जाएँ।” 

अटल बिहारी वाजपेयी जी को उनके जन्म शताब्दी वर्ष में स्मरण करना केवल अतीत की ओर देखना नहीं है। यह उस भारत के विचार के प्रति पुनः प्रतिबद्धता है जो सशक्त भी है और संवेदनशील भी, आधुनिक भी है और अपनी जड़ों से जुड़ा भी, महत्वाकांक्षी भी है और नैतिक भी। यही विचार आज भी राष्ट्र को दिशा दे रहा है और आने वाले वर्षों तक देता रहेगा।

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