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The Haryana Story | 58 साल की उम्र सीमा और राजनीतिक सिफारिश पर सवाल, PGIMS रोहतक के मेडिकल सुपरिटेंडेंट की पुनर्नियुक्ति पर HC का स्टे

58 साल की उम्र सीमा और राजनीतिक सिफारिश पर सवाल, PGIMS रोहतक के मेडिकल सुपरिटेंडेंट की पुनर्नियुक्ति पर HC का स्टे

रिटायरमेंट के बाद 3 साल की पुनर्नियुक्ति पर हाई कोर्ट की रोक, पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर की 'सिफारिश पत्र' का जिक्र

रोहतक/चंडीगढ़। पंडित बीडी शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PGIMS), रोहतक के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. कुंदन मित्तल की सेवानिवृत्ति के बाद तीन साल के लिए की गई पुनर्नियुक्ति पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। अदालत ने 3 अगस्त 2026 के पुनर्नियुक्ति आदेश और इसके बाद 6 अगस्त को विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) की ओर से पारित प्रस्ताव के संचालन पर अंतरिम रोक लगाई है।

मामला डॉ. अनिल पन्नीकर की ओर से दायर याचिका के जरिए हाई कोर्ट पहुंचा। याचिका में पुनर्नियुक्ति को विश्वविद्यालय के नियमों के विपरीत बताते हुए सवाल उठाए गए हैं। मामले की सुनवाई 16 सितंबर 2026 को हुई, जिसके बाद न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने संबंधित आदेशों पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 4 मार्च 2027 को निर्धारित की गई है।

30 जून को रिटायर हुए थे डॉ. मित्तल

याचिका में कहा गया है कि डॉ. कुंदन मित्तल 30 जून 2026 को सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद उन्होंने 14 मई को पुनर्नियुक्ति के लिए व्यक्तिगत प्रतिवेदन दिया। याचिका के अनुसार, इसके अगले दिन यानी 15 मई को हरियाणा के पूर्व मंत्री एवं भाजपा नेता मनीष कुमार ग्रोवर की ओर से उनके पक्ष में राजनीतिक सिफारिश की गई। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से उन्हें तीन साल की अवधि के लिए पुनर्नियुक्त किया गया।

मनीष ग्रोवर की सिफारिश में क्या कहा गया?

जानकारी मुताबिक, याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों में पूर्व मंत्री मनीष कुमार ग्रोवर का मुख्यमंत्री को संबोधित पत्र भी शामिल है। पत्र में डॉ. मित्तल को कुशल प्रशासक और दक्ष चिकित्सक बताते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं तथा जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों की मदद करने का उल्लेख किया गया। पत्र में विश्वविद्यालय और क्षेत्र में पार्टी के हितों को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने के लिए उनकी मौजूदगी को महत्वपूर्ण बताया गया था। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर तर्क दिया कि किसी वैधानिक पद पर नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति में राजनीतिक अथवा अन्य अप्रासंगिक आधारों को महत्व नहीं दिया जा सकता। हालांकि, हाई कोर्ट ने अभी इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और मामला आगे सुनवाई के लिए लंबित है।

58 साल की उम्र सीमा भी बनी विवाद का आधार

याचिका में PGIMS/विश्वविद्यालय के नियमों का हवाला देते हुए कहा गया है कि मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के पद पर 58 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति की नियुक्ति नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ता का दावा है कि डॉ. मित्तल की पुनर्नियुक्ति के समय यह आयु सीमा लागू थी और कार्यकारी परिषद के पास इस वैधानिक शर्त में छूट देने का अधिकार नहीं था। याचिकाकर्ता ने 6 अगस्त की कार्यकारी परिषद की बैठक में पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दिए जाने को भी चुनौती दी है। हाई कोर्ट के समक्ष राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल नवीन सिंह पंवार और विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता निलेश भारद्वाज पेश हुए। दोनों पक्षों ने नोटिस स्वीकार किया और मामले में पूरी जानकारी हासिल करने के लिए समय मांगा।

हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

हाई कोर्ट ने फिलहाल 3 अगस्त के पुनर्नियुक्ति आदेश और 6 अगस्त के कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव के संचालन पर रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय लागू वैधानिक प्रावधानों और नियमों के अनुसार मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति करने के लिए स्वतंत्र है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल अदालत ने केवल संबंधित पुनर्नियुक्ति आदेश पर अंतरिम रोक लगाई है। पुनर्नियुक्ति कानूनी रूप से अंतिम तौर पर वैध थी या नहीं, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

डॉ. मित्तल ने क्या कहा?

डॉ. मित्तल से इस मामले में प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा कि इस तरह के पत्र आते रहते हैं और संबंधित पत्र का कोई उचित आधार या प्रासंगिकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने कार्यालय में काम कर रहे हैं। वहीं विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एचके अग्रवाल से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार उनकी ओर से जवाब नहीं मिला। अब इस मामले में अगली सुनवाई 4 मार्च 2027 को होगी। तब तक अदालत के अंतरिम आदेश के कारण 3 अगस्त के पुनर्नियुक्ति आदेश और 6 अगस्त के कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव पर रोक प्रभावी रहेगी।

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