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The Haryana Story | बेजुबान बंदरों का मसीहा : एक 'दर्दनाक हादसे' ने बदल दी 'पवन' की दुनिया, बनना था 'मॉडल' बन गए 'मसीहा'

बेजुबान बंदरों का मसीहा : एक 'दर्दनाक हादसे' ने बदल दी 'पवन' की दुनिया, बनना था 'मॉडल' बन गए 'मसीहा'

बेजुबान बंदरों का मसीहा : एक 'दर्दनाक हादसे' ने बदल दी 'पवन' की दुनिया, बनना था 'मॉडल' बन गए 'मसीहा'

इंसानियत की मिसालें तो आपने बहुत देखी होंगी, लेकिन हरियाणा के करनाल के रहने वाले पवन सिंह की कहानी कुछ अलग है। पवन आज उन बेजुबान बंदरों के लिए 'मसीहा' बन चुके हैं, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं या जिनसे डरते हैं। उनकी इस सेवा की शुरुआत 6 साल पहले एक भावुक कर देने वाली घटना से हुई। इसके बाद पवन ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह करीब 10000 बेजुबान दिनों के लिए मसीहा बन चुके हैं उनको रेस्क्यू करके एक नई जिंदगी दे चुके हैं। इतना ही नहीं किसी समय में पवन को मॉडलिंग करने का शौक था लेकिन उन्होंने मॉडलिंग को छोड़कर बेजुबानों की सेवा करना ही अपना जीवन का लक्ष्य बनाया है।

 

कैसे हुई इस की शुरुआत 

पवन ने बताया कि एक हादसे में जब एक बंदर की माँ की मृत्यु हो गई, तो वह छोटा बंदर अपनी माँ के पास बैठकर दूध के लिए रोता रहा। इस दृश्य ने पवन का दिल झकझोर दिया। उन्होंने उस बंदर को गोद लिया और रात भर अस्पताल में उसकी देखभाल की। और वहीं से पवन के जीवन की एक अलग शुरुआत हुई। पवन ने 6 साल पहले इसकी शुरुआत की थी जो अब एक बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है। NGO करनाल रॉकस्टार्स आज पवन अंजनी एनिमल फाउंडेशन और 'करनाल रॉकस्टार्स' NGO के जरिए करीब 10,000 बंदरों को नया जीवन दे चुके हैं। जितने भी घायल और बीमार बंदर होते हैं उनको वह रेस्क्यू करके लेकर आते हैं और उसके बाद उनके महीना तक इलाज करते हैं और फिर सुरक्षित स्थान पर छोड़ देते हैं। वे केवल करनाल ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी घायल बंदरों को रेस्क्यू करने जाते हैं।

सोशल मीडिया की आमदनी से करते हैं आर्थिक सहयोग और खर्च

पवन ने बताया कि जब उनको मॉडलिंग का शौक था तब उन्होंने करनाल रॉकस्टार के नाम से अपना सोशल अकाउंट बनाया था उसे पर उनके काफी अच्छे फॉलोअर थे और उन्होंने करनाल रॉकस्टार अकाउंट को ही बेजुबानों को समर्पित कर दिया । पवन अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से होने वाली कमाई का आधा से ज्यादा हिस्सा इन बेजुबानों के इलाज और चारे पर खर्च करते हैं। बंदरों के रखरखाव और खाने-पीने पर हर महीने करीब 2.5 से 3 लाख रुपए (रोजाना 8 से 10 हजार) रुपए का खर्च आता है।  इसमें उनका खाने का खर्च आने जाने का खर्च एंबुलेंस का खर्च और इलाज का खर्च सभी शामिल है।

बेजुबान के लिए बनाया स्थायी शेल्टर

होम पवन ने बताया कि अब घायल और लावारिस बंदरों के लिए एक स्थायी शेल्टर होम बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं, ताकि उन्हें सही समय पर मेडिकल सहायता मिल सके। उन्होंने बताया कि पहले उन्होंने करनाल की ही एक कॉलोनी में छोटा सा सेंटर होम बनाया था लेकिन डॉग और मंकी आवाज करते हैं । पड़ोसी उनकी शिकायत कर देते हैं लेकिन अब वह शहर से दूर एक बड़ा शेल्टर होम बना रहे हैं जिसमें बेजुबान से उनका वहां कोई भी समस्या नहीं होगी।

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