आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तकनीक के विस्तार ने युवाओं की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन डिजिटल दुनिया का यह बढ़ता प्रभाव अब एक 'साइलेंट किलर' के रूप में उभर रहा है। मनोवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि मोबाइल, सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल युवाओं की न सिर्फ नींद छीन रहा है, बल्कि उन्हें मानसिक बीमारियों की ओर भी धकेल रहा है। युवाओं में डिजिटल दुनिया का प्रभाव एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। मोबाइल, सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन का इस्तेमाल युवाओं की नींद पर गंभीर असर डाल रहा है, जिससे स्लीप डिसऑर्डर, एंग्जायटी, डिप्रेशन, और एकाग्रता में कमी जैसी गंभीर मानसिक व शारीरिक समस्याएं पैदा हो रही है आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
नींद की कमी और व्यवहार में बदलाव
प्रसिद्ध साइकोलॉजिस्ट यशदीप मलिक के अनुसार, डिजिटल गैजेट्स के कारण युवाओं की नींद के पैटर्न में भारी गिरावट आई है। उनके द्वारा किए गए शोध और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के विश्लेषण से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मलिक बताते हैं कि नींद की कमी का सीधा असर व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ता है। जो किशोर रात में 7 घंटे से कम सोते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार की संभावना 8 घंटे या उससे अधिक सोने वालों की तुलना में 1.5 से 2 गुना अधिक होती है। पर्याप्त नींद न मिलने से मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित होता है जो भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करता है, जिससे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना आम हो जाता है। जिन लोगों को नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं उनमें आत्महत्या के विचार और प्रयास का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक हो सकता है।
साइकोलॉजिस्ट यशदीप मलिक
आत्महत्या की प्रवृत्ति और अनिद्रा का संबंध
रिपोर्ट में सबसे डरावना पहलू नींद की कमी और आत्महत्या के विचारों के बीच का संबंध है। यशदीप मलिक के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि नींद की गंभीर समस्याओं (Insomnia) से जूझ रहे युवाओं में आत्महत्या के विचार और प्रयास का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक हो सकता है। नींद की कमी न केवल अवसाद (Depression) को जन्म देती है, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता को भी कमजोर करती है, जिससे युवा आवेश में आकर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
डिजिटल स्क्रीन: नींद की सबसे बड़ी दुश्मन
देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल करने से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' शरीर में मेलाटोनिन (नींद लाने वाला हार्मोन) के स्तर को कम कर देती है। सोशल मीडिया पर घंटों बिताने से न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि दूसरों की जीवनशैली से तुलना करने पर युवाओं में हीन भावना और एंग्जायटी भी बढ़ रही है।
आंकड़े और तथ्य
युवाओं में 70% से अधिक लोग देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। आत्महत्या के मामलों में 15-29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। डिजिटल लत के कारण युवाओं में अवसाद और आक्रामक व्यवहार की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
साइकोलॉजिस्ट्स मलिक की सलाह: क्या करें?
साइकोलॉजिस्ट्स मलिक ने युवाओं और अभिभावकों के लिए कुछ जरूरी सुझाव दिए
- डिजिटल डिटॉक्स: सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप से दूरी बना लें।
- स्लीप हाइजीन: सोने और जागने का एक निश्चित समय तय करें।
- 8 घंटे की नींद: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए कम से कम 8 घंटे की गहरी नींद अनिवार्य है।
- देर रात तक स्क्रीन का इस्तेमाल न करें और सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित करें
- नियमित व्यायाम और ध्यान करें
- लक्षणों को पहचानें: यदि व्यवहार में अचानक बदलाव या उदासी दिखे, तो तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें।
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