हरियाणा के रेवाड़ी जिले के गांव काठुवास में शुक्रवार का सूरज मातम लेकर आया। जिस बेटे को परिवार ने सुनहरे भविष्य और एमबीए की पढ़ाई के लिए बड़े अरमानों के साथ रूस (मॉस्को) भेजा था, उसका पार्थिव शरीर करीब 6 महीने बाद तिरंगे में लिपटकर घर पहुंचा। 22 वर्षीय अंशु की मौत यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की तरफ से लड़ते हुए हुई थी। जैसे ही अंशु का शव गांव पहुंचा, पूरे इलाके में चीख-पुकार मच गई और हर आंख नम हो गई।
पढ़ाई के बहाने भेजा, जंग के मैदान में धकेला
अंशु स्टडी वीजा पर रूस गया था, लेकिन वहां उसके साथ बड़ा धोखा हुआ। अगस्त 2024 में उसे और उसके जैसे कई अन्य युवाओं को धोखे से रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया। बिना किसी विशेष सैन्य प्रशिक्षण के, उन्हें सीधे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के मैदान में धकेल दिया गया। परिवार का आरोप है कि अंशु वहां एमबीए करने गया था, लेकिन उसे जबरन हथियार थमा दिए गए।
14 अक्टूबर को हुई थी मौत, 6 महीने तक चला संघर्ष
युद्ध के मोर्चे पर लड़ते हुए 14 अक्टूबर 2025 को अंशु की जान चली गई। उसकी मौत की खबर के बाद से ही परिवार उसे वापस वतन लाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा था। अंशु के पिता राकेश और परिजनों ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे के शव को वापस लाने के लिए केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय से कई बार गुहार लगाई।
विदेश मंत्री और हनुमान बेनीवाल की भूमिका
परिवार की लंबी लड़ाई में राजस्थान के नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने पीड़ित परिवार की मुलाकात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से करवाई। विदेश मंत्री ने परिवार को आश्वासन दिया था कि अंशु के शव को सम्मान सहित वापस लाया जाएगा। इस आश्वासन के कुछ समय बाद ही पिता राकेश के पास शव भारत भेजने की आधिकारिक सूचना आई।
हरियाणा के 7 युवा अभी भी लापता
अंशु की मौत ने उन खतरों को फिर से उजागर कर दिया है, जिसका सामना विदेश जाने वाले भारतीय युवा कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, रूसी सेना में भर्ती हुए भारत के 26 लापता युवाओं में से 7 अकेले हरियाणा के हैं। अंशु के गांव काठुवास में गमगीन माहौल के बीच उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया, लेकिन यह घटना पीछे कई अनसुलझे सवाल और उन परिवारों की चिंता छोड़ गई है जिनके बच्चे अभी भी युद्ध के मोर्चे पर फंसे हुए हैं।
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