loader
The Haryana Story | डॉलर की 'सुपरपावर' के आगे बेबस हुआ रुपया, इतिहास में पहली बार 96 पार- डॉलर की आंधी में रिकॉर्ड निचले स्तर पर सिमटा रुपया

डॉलर की 'सुपरपावर' के आगे बेबस हुआ रुपया, इतिहास में पहली बार 96 पार- डॉलर की आंधी में रिकॉर्ड निचले स्तर पर सिमटा रुपया

भारतीय करेंसी ने पार की खतरे की अंतिम लाइन, डॉलर की इस ऐतिहासिक छलांग से अब क्या-क्या होगा महंगा?

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.07 के अब तक के सबसे निचले रिकॉर्ड स्तर (All-Time Low) पर पहुंच गया है। वैश्विक बाजारों में मंदी, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के कारण घरेलू मुद्रा पर यह ऐतिहासिक दबाव देखा गया है। इतिहास में यह पहली बार है जब रुपये ने डॉलर के मुकाबले 96 का मनोवैज्ञानिक स्तर पार किया है, जिससे यह इस साल एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गई है।इस बड़ी आर्थिक गिरावट और आपके बजट पर होने वाले इसके सीधे असर से जुड़ी पूरी विस्तृत रिपोर्ट नीचे दी गई है:

बाजार का ताजा हाल और गिरावट का नया रिकॉर्ड

15 मई 2026 को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार (Interbank Foreign Exchange Market) में भारतीय रुपया भारी दबाव के साथ खुला। कारोबारी सत्र के दौरान चौतरफा बिकवाली और वैश्विक दबाव के कारण रुपया लुढ़कते हुए 96.07 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर को छू गया। हालांकि, दिन के अंत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के कथित हस्तक्षेप और बाजार में सुधार के प्रयासों के बाद यह थोड़ा संभलकर 95.97 के स्तर पर बंद हुआ, जो कि अब तक की सबसे कमजोर क्लोजिंग है।

रुपया गिरने के 4 मुख्य कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय करेंसी में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे ये चार बड़े वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं:

कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें: मिडिल ईस्ट (विशेषकर अमेरिका-इरान) में जारी युद्ध और तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार ऊंची बनी हुई हैं। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक तेल आयात करता है, जिससे तेल का बिल चुकाने के लिए डॉलर की मांग अचानक बहुत बढ़ गई है।

विदेशी निवेशकों (FIIs) की भारी बिकवाली: विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपने पैर खींचे हैं और इस साल बड़े पैमाने पर फंड बाहर निकाला है। पूंजी की इस निकासी (Capital Outflow) से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ा है।

ग्लोबल मार्केट में मजबूत होता डॉलर: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त नीतियों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षित निवेश के रूप में दुनिया भर के निवेशक अमेरिकी डॉलर की ओर भाग रहे हैं, जिससे डॉलर इंडेक्स लगातार मजबूत हो रहा है।

बढ़ता व्यापार घाटा (Trade Deficit): निर्यात के मुकाबले भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा है, जिससे देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी प्रभावित हुआ है। 

आम जनता और आपकी जेब पर इसका क्या असर होगा?

डॉलर के मुकाबले रुपये की इस कमजोरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सीधे तौर पर आम नागरिकों के घरेलू बजट पर पड़ने वाला है। भारत जिन चीजों का बड़े पैमाने पर आयात करता है (जैसे कच्चा तेल, खाद्य तेल, दालें और इलेक्ट्रॉनिक सामान), वे महंगी हो जाएंगी। इसके चलते घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। जो भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके अभिभावकों पर बोझ बढ़ जाएगा क्योंकि अब फीस और रहने के खर्च के लिए अधिक रुपये चुकाने होंगे। इसी तरह विदेशों की यात्रा करना भी काफी महंगा हो जाएगा।

किसे होगा इस गिरावट से फायदा?

रुपये के कमजोर होने से हर किसी को नुकसान नहीं होता है। देश के निर्यातकों (Exporters) को इसका सीधा फायदा मिलता है। विशेष रूप से भारत के आईटी (IT Services) और फार्मास्युटिकल (दवा) सेक्टर की कमाई डॉलर में होती है, इसलिए रुपया गिरने से उनका रेवेन्यू और मुनाफा भारतीय रुपये की वैल्यू में बढ़ जाएगा।

Join The Conversation Opens in a new tab
×