भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विरोध-प्रदर्शनों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में हर नागरिक को कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का मौलिक अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में सड़कों को ब्लॉक करने, कानून-व्यवस्था बिगाड़ने या डर का माहौल बनाने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।
'प्रदर्शन आपका हक, पर दूसरों के लिए आफत नहीं'
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान सख्त लहजे में दिशा-निर्देश दिए। प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर उतरकर आम जनता के लिए मुश्किलें खड़ी करने का कोई अधिकार नहीं है। आंदोलन के नाम पर किसी को धमकी देने या कानून-व्यवस्था को चुनौती देने की इजाजत नहीं मिल सकती। युवाओं को नसीहत देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर वे हिंसक प्रदर्शनों या रास्ता रोकने जैसी गतिविधियों में शामिल होंगे, तो उन पर आपराधिक मामले दर्ज होंगे जिससे उनका भविष्य और करियर बर्बाद हो सकता है।
किस मामले पर हुई सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई?
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नामकरण से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता 'प्रकाशझोट सामाजिक संस्था' ने मांग की थी कि महाराष्ट्र सरकार के उस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार समयसीमा के भीतर फैसला ले, जिसमें हवाई अड्डे का नाम बदलकर 'लोकनेता डी.बी. पाटिल' रखने की बात कही गई है। कोर्ट में दलील दी गई कि नाम बदलने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं के खिलाफ पुलिस केस दर्ज कर रही है, जिससे उनका करियर खतरे में है। कोर्ट ने इस याचिका पर हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत ने कहा कि किसी एयरपोर्ट का नाम क्या होना चाहिए, यह तय करना अदालत का काम नहीं बल्कि नीतिगत मामला है।
'सरकार तुरंत न सुने, तो मांग उठाते रहें लेकिन सही मंच पर'
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए प्रदर्शनकारियों को लोकतांत्रिक तरीका अपनाने की सलाह दी। यदि सरकार आपकी मांगों पर तुरंत जवाब नहीं देती, तो उचित मंच पर लगातार अपनी आवाज उठाते रहें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आखिरकार अधिकारियों और सरकार को यह समझ आता है कि किसी मुद्दे पर फैसला लेना जरूरी है, लेकिन इसके लिए कानून हाथ में लेना सही नहीं है।
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