ग्लोबल वार्मिंग और बदलते वैश्विक घटनाक्रमों के बीच देश के मौसम का मिजाज पल-पल बदल रहा है। इस साल मौसम चक्र में आए अप्रत्याशित बदलावों को लेकर केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI), करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र बुंदेला ने बेहद चौंकाने वाले और सटीक वैज्ञानिक तथ्य साझा किए हैं। डॉ. बुंदेला के मुताबिक, इस बार मौसम प्रणाली में कई ऐसे बड़े बदलाव देखे गए हैं, जो पिछले पूरे एक दशक में दर्ज नहीं किए गए।
मई-जून में रिकॉर्ड पश्चिमी विक्षोभ, गर्मी गायब होने से मानसून की रफ्तार सुस्त
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र बुंदेला ने बीते 10 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया कि इस साल देश में सबसे अधिक Western Disturbances सक्रिय हुए हैं। आमतौर पर मई और जून के जिन 7 सप्ताहों में उत्तर भारत में भीषण गर्मी और लू का प्रकोप रहता था, इस बार बार-बार पश्चिमी विक्षोभ आने के कारण उन हफ्तों में लगातार बारिश होती रही। इस बेमौसम बारिश की वजह से तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहा और लोगों को भीषण गर्मी से राहत तो मिली, लेकिन इसका वैज्ञानिक पहलू बेहद चिंताजनक है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने चेतावनी दी है कि मई-जून के महीनों में पर्याप्त गर्मी न पड़ने का सीधा और नकारात्मक असर अब मानसून की रफ्तार पर पड़ेगा। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में कम दबाव का क्षेत्र ठीक से विकसित नहीं हो पाया है, जिससे मानसून की प्रगति धीमी हो गई है।
'अल नीनो' का साया: इस साल 10 प्रतिशत कम बरसेंगे बदरा
कृषि और आम जनजीवन के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस साल मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। सीएसएसआरआई के वैज्ञानिक ने बताया कि इस बार प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' का प्रभाव बेहद सक्रिय है। अल नीनो की सक्रियता के कारण समुद्री हवाओं का रुख प्रभावित होता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, अल नीनो के इस कड़े रुख के कारण इस साल देश में सामान्य से करीब 10 प्रतिशत कम बारिश होने की आशंका है। बारिश में यह कमी मुख्य रूप से उन कृषि प्रधान क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है जो पूरी तरह से मानसूनी खेती पर निर्भर हैं।
कृषि सेक्टर पर संकट: वैज्ञानिकों ने दी तैयारी रखने की सलाह
मानसून की सुस्त रफ्तार और बारिश में 10% की संभावित कमी को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए चिंता जताई है। डॉ. बुंदेला के अनुसार, मौसम के इस बदले मिजाज के कारण फसलों के चक्र और बुवाई के समय में बदलाव करना पड़ सकता है। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे कम पानी में तैयार होने वाली फसलों और मोटे अनाजों (Millets) की खेती को प्राथमिकता दें, ताकि पानी की कमी के संकट से निपटा जा सके।
ग्लोबल वार्मिंग ही नहीं, मिडिल ईस्ट की जंग भी मौसम बिगड़ने की वजह
मौजूदा वेदर सिस्टम में आ रहे बड़े बदलावों के कारणों को स्पष्ट करते हुए डॉ. बुंदेला ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि मौसम में आ रहे इस बदलाव के पीछे केवल ग्लोबल वार्मिंग ही एकमात्र कारण नहीं है। वैज्ञानिक के अनुसार, मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में चल रहे युद्ध और सैन्य गतिविधियां भी मौसम के इस बिगड़े मिजाज के पीछे एक बड़ा कारण हो सकती हैं। युद्ध के कारण वायुमंडल में भारी मात्रा में निकलने वाले प्रदूषक, बारूद का धुआं और कार्बन उत्सर्जन कहीं न कहीं वायुमंडलीय हवाओं के रुख और पश्चिमी विक्षोभ को प्रभावित कर रहे हैं।
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