हरियाणा के प्रशासनिक गलियारे से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। करीब 661 करोड़ रुपये के बहुचर्चित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाले में आरोपी और लंबे समय से निलंबित चल रहे IAS अधिकारी प्रदीप डागर (प्रदीप कुमार) को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने उनके रिटायरमेंट के दिन ही गिरफ्तार कर लिया है। वह पिछले कुछ दिनों से जांच एजेंसी की रडार पर थे और मोबाइल बंद करके भूमिगत हो गए थे। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में अग्रिम जमानत याचिका भी लगाई थी, लेकिन राहत मिलने से पहले ही सीबीआई ने यह बड़ा एक्शन ले लिया।
बड़ी कार्रवाई पर एक नज़र
अरेस्ट का दिन: 30 जून 2026, यानी उनकी सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति का अंतिम दिन।
मुख्य आरोप: हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सरकारी खाते से 169 करोड़ रुपये का गबन।
निलंबन: भ्रष्टाचार में नाम आने के बाद इस साल 8 अप्रैल से वह सस्पेंड चल रहे थे।
घोटाले की कुल रकम: अलग-अलग विभागों को मिलाकर कुल 661 करोड़ रुपये का बैंक फ्रॉड।
अग्रिम जमानत याचिका: गिरफ्तारी से ठीक पहले पंचकूला की सीबीआई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खाते से उड़ाई भारी रकमप्रदीप डागर वर्ष 2011 बैच के एचसीएस अधिकारी हैं, जो प्रमोट होकर आईएएस बने थे। वे अगस्त 2022 से दिसंबर 2025 तक हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव के पद पर तैनात थे। सीबीआई की जांच के मुताबिक, इसी कार्यकाल के दौरान चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की शाखा में मौजूद बोर्ड के खाते से 169 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि अवैध रूप से ट्रांसफर की गई। इस घोटाले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि किसी एक अकेले विभाग से हुई यह अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय हेराफेरी मानी जा रही है।
शेल कंपनियों के जरिए निकाला गया पैसा
जांच एजेंसियों के अनुसार, सरकारी फंड को नियमों को ताक पर रखकर पहले निजी बैंकों में ट्रांसफर किया गया। इसके बाद, बैंक अधिकारियों से सांठगांठ कर फर्जी (शेल) कंपनियों के एक बड़े नेटवर्क के माध्यम से करोड़ों की इस राशि को बाहर निकाल लिया गया। मामले में पुलिस द्वारा पहले गिरफ्तार किए गए एक डेटा एंट्री ऑपरेटर ने कबूला था कि यह सारा लेन-देन सीधे आईएएस अधिकारी के इशारे पर ही अंजाम दिया गया था।
पीएमओ स्तर से हो रही है निगरानी, कई आईएएस अंदर
हरियाणा का यह 661 करोड़ का बैंक घोटाला इतना गंभीर है कि इसकी मॉनिटरिंग सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय स्तर से की जा रही है। सीबीआई इस मामले की जांच 'डिपार्टमेंट-टू-डिपार्टमेंट' मॉडल पर कर रही है।प्रदीप डागर के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-A के तहत केस चल रहा है। आपको बता दें कि इस महाघोटाले में सीबीआई केवल डागर ही नहीं, बल्कि दो अन्य वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पंकज अग्रवाल और आरके सिंह को भी पहले ही सलाखों के पीछे भेज चुकी है।
करोड़ों की बेनामी संपत्ति भी आई सामने
वर्ष 2025-26 के अचल संपत्ति रिटर्न (IPR) के दस्तावेजों के अनुसार, प्रदीप डागर के पास गुरुग्राम और रोहतक में करोड़ों रुपये की अचल संपत्तियां हैं। रोहतक में करीब 3,181 वर्ग गज की भूमि, जिसकी सरकारी कीमत करीब 1.25 करोड़ रुपये घोषित है। गुरुग्राम सेक्टर-28 में पत्नी के साथ संयुक्त और एकल नाम पर करोड़ों के दो आलीशान प्लॉट। गुरुग्राम के आलीशान 'एटलस प्लेटिनम टावर्स' में एक फ्लैट (नंबर ए-1702), जिसकी घोषित कीमत ही 3.34 करोड़ रुपये से अधिक है। रिटायरमेंट के ठीक पहले लापता होने और फोन बंद करने के बाद सीबीआई की कई टीमें लगातार छापेमारी कर रही थीं, जिसके बाद आखिरकार उन्हें दबोच लिया गया। सेवा से निवृत होने के बावजूद उन पर यह आपराधिक और कानूनी कार्रवाई पूरी सख्ती से जारी रहेगी।
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