पुणे के बहुचर्चित सिया-केतन मर्डर केस ने देश में पुरुषों के कानूनी अधिकारों और सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। इस मामले के सामने आने के बाद संसद में 'नेशनल कमीशन फॉर मेन बिल' (राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक) को लेकर मांग एक बार फिर तेज हो गई है। बीजेपी राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने इस वीभत्स हत्याकांड पर गहरा दुख जताते हुए जोर देकर कहा है कि "पुरुष भी अत्याचार और साजिशों के पीड़ित हो सकते हैं"। उन्होंने हर पीड़ित को लिंग के भेदभाव के बिना कानून के तहत समान सुरक्षा और न्याय देने की वकालत की है।
दुर्घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी खौफनाक साजिश निकली
पुणे के 26 वर्षीय रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की लोनावला के लोहगढ़ किले के पास एक पहाड़ी से गिरकर मौत हो गई थी। पुलिस जांच में यह एक दुर्घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी खौफनाक साजिश निकली। आरोप है कि केतन की मंगेतर सिया गोयल (20) ने अपने कथित प्रेमी चेतन चौधरी (22) के साथ मिलकर केतन को खाई में धक्का दे दिया था। पुलिस ने फोन डेटा और कोड वर्ड वाली बातचीत को डिकोड कर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जिन्हें कोर्ट ने 16 जुलाई तक 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
सांसद अशोक मित्तल ने साझा किया संसद का वीडियो
इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक और राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी बात रखी। उन्होंने दिसंबर 2025 में संसद के ऊपरी सदन में अपने द्वारा पेश किए गए 'द नेशनल कमीशन फॉर मेन बिल' (प्राइवेट मेंबर बिल) की कार्यवाही का वीडियो दोबारा साझा किया।
पुरुष भी साजिशों और घरेलू अपराधों के पीड़ित हो सकते हैं..
सांसद मित्तल ने लिखा - "पुणे का केतन अग्रवाल मामला बेहद परेशान करने वाला है। केतन का मामला एक कड़वा सबक और चेतावनी है कि पुरुष भी साजिशों और घरेलू अपराधों के पीड़ित हो सकते हैं। उन्हें भी कानूनी सुरक्षा, संस्थागत मदद और एक ऐसा मंच मिलना चाहिए जहां उनकी आवाज सुनी जा सके। न्याय लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी के लिए समान होना चाहिए।
'क्या है 'नेशनल कमीशन फॉर मेन बिल' और इसकी मुख्य बातें?
सांसद द्वारा संसद में पेश किए गए इस प्रस्तावित कानून (प्राइवेट मेंबर बिल) का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की तर्ज पर पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करना है। पुरुषों की शिकायतों की सुनवाई के लिए एक अध्यक्ष और 6 सदस्यीय निष्पक्ष समिति का गठन। आयोग के पास गवाहों को समन जारी करने और दस्तावेज़ों की जांच करने का पूरा अधिकार होगा। पुरुषों को झूठे मुकदमों में फंसाने वालों के लिए 7 से 10 साल की कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान। झूठे आरोपों और बच्चों की कस्टडी से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन, जो 6 महीने के भीतर फैसला सुनाएंगी।
मानसिक स्वास्थ्य और कानूनी सहायता
पुरुष आत्महत्या दरों, अवसाद, घरेलू शोषण और बाल कस्टडी जैसे मुद्दों पर शोध और पीड़ितों को मुफ्त कानूनी-मानसिक काउंसलिंग देना। अदालती फैसले से पहले मीडिया ट्रायल के जरिए किसी पुरुष को बदनाम करने पर 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव।
कानून बनने की राह कितनी आसान?
हालांकि, इस हाई-प्रोफाइल मामले के बाद सोशल मीडिया पर पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा इस बिल को तुरंत पास करने की मांग की जा रही है, लेकिन तकनीकी रूप से यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है। भारतीय संसदीय इतिहास में 1970 के बाद से कोई भी प्राइवेट मेंबर बिल संसद के दोनों सदनों से पास होकर कानून नहीं बन सका है। फिर भी, इस संवेदनशील मामले ने देश में कानून को 'जेंडर-न्यूट्रल' (लिंग-निरपेक्ष) बनाने की जरूरत पर एक बहुत बड़ा वैचारिक आंदोलन खड़ा कर दिया है।
related
खतरे में जिंदगियां: अवैध पटाखा गोदाम में धमाके से हिलीं कईं मकानों की नींव, मलबे की चपेट में आई बच्ची
अमर हुआ खाकी का फर्ज: ब्रेन डेड होने के बाद भी कुलदीप ने निभाया 'रक्षक' का धर्म, अंगदान की पेश की मिसाल
आबादी के करीब मंडराया तेंदुआ, शिकार मुंह में दबोचे दिखा, प्रतापनगर के मांडेवाला गऊशाला क्षेत्र में दहशत
Latest stories
CISF की जांबाज खिलाड़ी ने चीन में गाड़ा जीत का झंडा, रितु श्योराण की कप्तानी में भारतीय महिला कबड्डी टीम ने जीता गोल्ड
पानीपत के 35 गांवों की बदलेगी सूरत, 'मास्टर प्लान' तैयार, जानिए केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल का 'मिशन विलेज'
फिरोजपुर झिरका में सीवर की जहरीली गैस ने छीनी दो मजदूरों की जिंदगी, ठेकेदार फरार, जिम्मेदार कौन?