रोहतक में एक युवा हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) डॉ. आदित्य बत्रा की हृदयाघात से हुई दुखद मृत्यु ने पूरे चिकित्सा जगत को गहरे सदमे में डाल दिया है। जो चिकित्सक दूसरों के हृदय की धड़कनों को बचाने के लिए प्रशिक्षित था, उसका स्वयं इतनी कम आयु में हृदयाघात से निधन होना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि यह देशभर के स्वास्थ्य कर्मियों पर बढ़ रहे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक दबाव का गंभीर संकेत है। इस दुखद घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एन.सी. मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, इसराना के अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक, पूर्व सिविल सर्जन यमुनानगर तथा हरियाणा सिविल मेडिकल सर्विसेज एसोसिएशन (एचसीएमएसए) के पूर्व राज्याध्यक्ष डॉ. विजय दहिया ने कहा कि "सफेद कोट के पीछे भी एक इंसान होता है, जो थकान, चिंता, दुःख और मानसिक तनाव महसूस करता है, लेकिन समाज अक्सर डॉक्टरों से यह अपेक्षा करता है कि वे बिना थके लगातार कार्य करते रहें।"
लगातार लंबी ड्यूटी, बार-बार रात्रि शिफ्ट
उन्होंने कहा कि चिकित्सा सेवा सदैव चुनौतीपूर्ण रही है, किंतु पिछले कुछ वर्षों में युवा डॉक्टरों पर कार्य का दबाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है। लगातार लंबी ड्यूटी, बार-बार रात्रि शिफ्ट, अस्पतालों में अत्यधिक मरीजों की संख्या, चिकित्सकों की कमी, बढ़ती प्रशासनिक जिम्मेदारियां तथा चिकित्सा संबंधी मुकदमों का भय इस पेशे को अत्यंत तनावपूर्ण बना रहा है। अनेक रेजिडेंट डॉक्टर 24 से 36 घंटे तक लगातार कार्य करते हैं, जिसके दौरान उन्हें पर्याप्त विश्राम, पौष्टिक भोजन अथवा परिवार के साथ समय बिताने का अवसर भी नहीं मिल पाता। ऐसी परिस्थितियां उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अवसाद, चिंता, बर्नआउट तथा अचानक हृदयाघात जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ा देती हैं।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सनसनी फैलाने वाले कंटेंट
डॉ. दहिया ने आगे कहा कि डॉक्टरों के विरुद्ध हिंसा की बढ़ती घटनाएं भी अत्यंत चिंताजनक हैं। अनेक सरकारी एवं निजी अस्पतालों में भावनात्मक तनाव के दौरान मरीजों के परिजन कभी-कभी डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार, धमकी, तोड़फोड़ तथा शारीरिक हमला तक कर बैठते हैं। ऐसी घटनाओं के कारण डॉक्टरों का ध्यान मरीजों के उपचार से हटकर अपनी सुरक्षा की चिंता पर केंद्रित होने लगता है। इसका प्रतिकूल प्रभाव चिकित्सकीय निर्णयों, कार्यक्षमता तथा युवा चिकित्सकों के मनोबल पर पड़ता है। परिणामस्वरूप कई युवा डॉक्टर आपातकालीन चिकित्सा, गहन चिकित्सा (आईसीयू) तथा शल्य चिकित्सा जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों से दूरी बनाने लगते हैं। डॉ. दहिया ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सनसनी फैलाने वाले कंटेंट निर्माताओं की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
अधिक दर्शक और लोकप्रियता प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रस्तुत एकतरफा
लोकतंत्र में जिम्मेदार पत्रकारिता और रचनात्मक आलोचना आवश्यक है, किंतु केवल अधिक दर्शक और लोकप्रियता प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रस्तुत एकतरफा और भावनात्मक सामग्री समाज में डॉक्टरों के प्रति अविश्वास और आक्रोश को बढ़ावा देती है। चिकित्सा विज्ञान के तथ्यों की तुलना में भावनात्मक कथाएं अधिक तेजी से फैलती हैं, जिससे डॉक्टरों की छवि प्रभावित होती है। एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब उसके डॉक्टर भी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों। अब समय आ गया है कि आक्रोश की जगह संवेदनशीलता, टकराव की जगह संवाद और अविश्वास की जगह विश्वास को बढ़ावा दिया जाए, ताकि हमारे अस्पताल मरीजों के साथ-साथ उन्हें उपचार देने वाले डॉक्टरों के लिए भी सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान बने रहें।
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