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The Haryana Story | सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - सरकारी नौकरी पर शादीशुदा बेटी का भी हक, राज्यों की भेदभावपूर्ण नीतियां खारिज!

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - सरकारी नौकरी पर शादीशुदा बेटी का भी हक, राज्यों की भेदभावपूर्ण नीतियां खारिज!

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी - 'शादी के बाद बेटी पराई नहीं होती'

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सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पिता या माता की मृत्यु के बाद शादीशुदा बेटी भी अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी पाने की पूरी हकदार है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल 'विवाहित' होने के आधार पर किसी बेटी को इस हक से वंचित करना पूरी तरह असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है।

बेटियों को केवल विवाह के आधार पर बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का खुला उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने शायरा खातून बनाम बिहार राज्य मामले में तथा इससे पहले जून 2026 में जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि 'यह मानना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है कि बेटी शादी के बाद अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा नहीं रहती है।' कोर्ट ने पुरानी रूढ़िवादी सोच को खारिज करते हुए कहा कि जब विवाहित बेटों को परिवार का सदस्य मानकर नौकरी दी जा सकती है, तो बेटियों को केवल विवाह के आधार पर बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का खुला उल्लंघन है।

बिहार सरकार की 'शर्त' को कोर्ट ने बताया असंवैधानिक

यह मामला तब सामने आया जब बिहार सरकार की 2014 की एक नीति के तहत एक महिला का आवेदन सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि वह न तो तलाकशुदा थी और न ही परित्यक्ता (पति द्वारा छोड़ी गई)। पटना हाईकोर्ट ने भी सरकार के फैसले को सही ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पटना हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया और बिहार सरकार की उस नीति को असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि 8 सप्ताह के भीतर महिला की नियुक्ति पर योग्यता के आधार पर विचार किया जाए।

नौकरी पाने के लिए जरूरी शर्तें

अदालत ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा बेटी को नौकरी पाने के लिए कुछ कानूनी शर्तों को पूरा करना होगा। मुख्य आधार निर्भरता प्रमाण पत्र होगा कि बेटी अपने माता-पिता की मृत्यु के समय उन पर आर्थिक रूप से निर्भर थी या नहीं। वैवाहिक स्थिति से ज्यादा जरूरी आर्थिक जरूरत है। परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों की तरफ से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जमा करना होगा। नौकरी पाने वाली बेटी को मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार (जैसे बुजुर्ग मां या छोटे भाई-बहन) की देखभाल करने की सहमति देनी होगी। आवेदक बेटी के पास उस पद के लिए आवश्यक शैक्षणिक और अन्य निर्धारित योग्यताएं होनी चाहिए।

इस फैसले का समाज और सरकारी कर्मचारियों पर असर

अब देश के किसी भी राज्य की सरकार अपनी नियमावली में 'विवाहित बेटी' को अनुकंपा कोटे से बाहर नहीं रख पाएगी। कानूनी और आर्थिक मोर्चे पर अब बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा मिल गया है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी का कोई बेटा नहीं है या बेटा परिवार को छोड़ चुका है, तो उसकी शादीशुदा बेटी नौकरी पाकर पूरे परिवार को आर्थिक संकट से बचा सकेगी।

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