आज की महिला पहले से कहीं अधिक शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक है। वह एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रही है, घर की जिम्मेदारी संभाल रही है, कॉर्पोरेट सीढ़ियाँ चढ़ रही है, बच्चों का भविष्य संवार रही है और सामाजिक बदलावों का नेतृत्व भी कर रही है। लेकिन 'सब कुछ संभाल लेने' की इस अंधी दौड़ में एक बेहद संवेदनशील सवाल पीछे छूट गया है, तमाम जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने वाली यह महिला खुद अंदर से कैसी है? क्या वह सच में खुश है, या सिर्फ 'मजबूत' होने का नाटक कर रही है? यह कहना है पानीपत के डॉ. नारायण दत्त हॉस्पिटल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. शाविका मेहता कालरा का।
जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने वाली यह महिला खुद अंदर से कैसी है?
आज की महिला पहले से कहीं अधिक शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक है। वह एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रही है, घर की जिम्मेदारी संभाल रही है, कॉर्पोरेट सीढ़ियाँ चढ़ रही है, बच्चों का भविष्य संवार रही है और सामाजिक बदलावों का नेतृत्व भी कर रही है। लेकिन 'सब कुछ संभाल लेने' की इस अंधी दौड़ में एक बेहद संवेदनशील सवाल पीछे छूट गया है, तमाम जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने वाली यह महिला खुद अंदर से कैसी है? क्या वह सच में खुश है, या सिर्फ 'मजबूत' होने का नाटक कर रही है?
डिजिटल दुनिया का अदृश्य मानसिक दबाव
डॉ. शाविका मेहता कालरा ने कहा कि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया ने हमारी जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हर रोज 'परफेक्ट लाइफ' की नुमाइश होती है। किसी की खूबसूरत तस्वीरें, शानदार वेकेशन, सफल करियर और मुस्कुराता हुआ परिवार स्क्रीन पर तैरता रहता है। जाने-अनजाने में आज की महिला अपनी रियल जिंदगी की तुलना दूसरों की इस वर्चुअल जिंदगी से करने लगी है। डॉ. शाविका मेहता कालरा के अनुसार यह तुलना महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा और नकारात्मक असर डाल रही है।
'मल्टीटास्किंग' की भारी कीमत
डॉ. शाविका मेहता कालरा आज समाज ने महिलाओं पर कई तरह के अदृश्य और कड़े मापदंड थोप दिए हैं, जिनमे हर उम्र और परिस्थिति में परफेक्ट और आकर्षक दिखना। वर्कप्लेस पर पुरुषों के बराबर खड़े होना, बच्चों की परवरिश से लेकर घर के बुजुर्गों की देखभाल में कोई कमी न छोड़ना। हर बड़ी से बड़ी मानसिक चोट या तनाव में भी खुद को चट्टान की तरह मजबूत दिखाना।
दोहरी भूमिका की मार: वर्कप्लेस पर खुद को साबित करने के साथ-साथ घर के चूल्हे-चौके को भी उतनी ही परफेक्शन से संभालना।
भावनाओं को दबाना: मानसिक चोट या अत्यधिक तनाव में भी रोने या कमजोर पड़ने की आजादी न होना, क्योंकि समाज उन्हें 'चट्टान' देखना चाहता है।
क्रॉनिक बर्नआउट: लगातार बिना थमे काम करने से शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाना।
मानसिक बीमारियां: खुद को परफेक्ट साबित करने की इस होड़ में एंग्जायटी और डिप्रेशन का तेजी से बढ़ना।
खुद की पहचान खोना: दूसरों की देखभाल और उम्मीदों को पूरा करते-करते खुद की इच्छाओं और स्वास्थ्य को भूल जाना।
इस जाल से बाहर निकलने के उपाय 'ना' कहना सीखें
- हर काम को खुद करने की जिम्मेदारी न लें।
- अपनी सीमाओं को पहचानें और जरूरत पड़ने पर मना करें।
- घर के काम और जिम्मेदारियों को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बराबरी से बांटें।
- 24 घंटे में से कुछ समय सिर्फ खुद के लिए निकालें, जिसमें कोई काम या जिम्मेदारी न हो।
- यह समझना जरूरी है कि रोना, थकना या कभी-कभी असफल होना पूरी तरह सामान्य है। आप इंसान हैं, कोई मशीन नहीं।
मजबूत होने का अर्थ हमेशा चुप रहना नहीं
डॉ. शाविका मेहता कालरा ने कहा कि कई महिलाएं तनाव, अकेलेपन, चिंता या भावनात्मक थकान से गुजरती हैं, लेकिन परिवार और समाज के सामने मुस्कुराती रहती हैं। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने कहा कि वे परेशान हैं, थक गई हैं या उन्हें मदद की जरूरत है, तो उन्हें कमजोर समझा जाएगा। हमें यह सोच बदलनी होगी। मजबूत होने का अर्थ हमेशा चुप रहना नहीं है। एक महिला का यह कहना कि 'मुझे भी आराम चाहिए', 'मैं परेशान हूं' या 'मुझे मदद की जरूरत है', उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता है। परिवार को भी महिलाओं से केवल उनकी जिम्मेदारियों के बारे में नहीं पूछना चाहिए। कभी उनके मन की भी बात सुननी चाहिए। कई बार समाधान देने से ज्यादा जरूरी होता है किसी को ध्यान से सुनना। बेटियों को केवल सुंदर दिखना नहीं, मजबूत महसूस करना सिखाएं।
महिला स्वास्थ्य केवल बीमारी से बचने का विषय नहीं
डॉ. शाविका मेहता कालरा ने कहा कि आज हमारी बेटियों को यह बताना भी जरूरी है कि उनकी पहचान केवल उनके रूप, विवाह, मातृत्व या सोशल मीडिया की लोकप्रियता से तय नहीं होती। उन्हें अपने शरीर का सम्मान करना, अपनी बात रखना, ‘ना’ कहना, आर्थिक और भावनात्मक रूप से आत्मनिर्भर बनना तथा जरूरत पड़ने पर मदद मांगना सिखाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
महिला स्वास्थ्य केवल बीमारी से बचने का विषय नहीं है। स्वास्थ्य का अर्थ है शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से संतुलित और भावनात्मक रूप से सुरक्षित होना। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम महिलाओं से केवल यह न कहें 'तुम बहुत मजबूत हो।' बल्कि यह भी कहें - 'तुम्हें हर समय मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं।' “महिला की असली खूबसूरती उसकी मुस्कान में नहीं, बल्कि उस मुस्कान के पीछे छिपे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में है।”
'परफेक्ट' नहीं, 'इंसान' होना जरूरी है'
दिखावे की इस अंतहीन दौड़ ने महिलाओं से उनका सुकून छीन लिया है। खुद को 'सुपरवुमन' साबित करने के इस सामाजिक दबाव में वे अवसाद और अकेलेपन का शिकार हो रही हैं। अब वक्त आ गया है जब समाज और खुद महिलाओं को यह समझना होगा कि हर परिस्थिति में 'परफेक्ट' होना जरूरी नहीं है। खुद के मानसिक सुकून के लिए कभी-कभी 'कमजोर' होना, थक जाना और मदद मांगना भी पूरी तरह सामान्य है।
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