दुनिया में बढ़ती गर्मी को लेकर एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। AGU Advances में 10 सितंबर 2026 को प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, पिछले करीब 45 वर्षों में दुनिया के लगभग आधे भू-भाग में अत्यधिक गर्मी का मौसम फैल गया है। खास बात यह है कि गर्मी अब केवल पारंपरिक गर्मियों के महीनों तक सीमित नहीं रह रही, बल्कि कई क्षेत्रों में यह वसंत यानी गर्मी के मुख्य मौसम से पहले या शरद ऋतु के बाद तक खिंच रही है।
बता दें कि AGU Advances पृथ्वी और अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित एक अत्यंत प्रतिष्ठित, अंतरराष्ट्रीय और 'ओपन एक्सेस' वैज्ञानिक जर्नल है। इसे American Geophysical Union (AGU) द्वारा John Wiley & Sons के सहयोग से प्रकाशित किया जाता है। इसका उद्देश्य पृथ्वी, पर्यावरण, ग्रह और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्रों में ऐसे उच्च-प्रभाव वाले शोध पत्रों को तेजी से प्रकाशित करना है, जिनका वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता दोनों पर व्यापक व सीधा असर पड़ता हो। यह पूरी तरह से ओपन एक्सेस जर्नल है।
45 साल के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर
शोधकर्ताओं ने 1980 से 2024 तक के वैश्विक मौसम आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके लिए NASA के MERRA-2 और यूरोपीय ERA5 री-एनालिसिस डेटा का इस्तेमाल किया गया। शोध में 1980 के दशक को आधार मानकर इसकी तुलना 2015-2024 के आंकड़ों से की गई। अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक शुष्क गर्मी का मौसम दुनिया के करीब 50 प्रतिशत भू-भाग में बढ़ा है, जबकि अत्यधिक आर्द्र गर्मी का मौसम करीब 48 प्रतिशत भू-भाग में विस्तारित हुआ है।
उत्तर-पश्चिम भारत में वसंत की ओर खिसक रही गर्मी
इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात भारत के लिए भी है। उत्तर-पश्चिम भारत उन क्षेत्रों में शामिल है जहां अत्यधिक गर्मी का विस्तार मुख्य गर्मी के मौसम के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले यानी वसंत की ओर अधिक हुआ है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में अत्यधिक गर्म दिनों की शुरुआत पारंपरिक गर्मी के मौसम से पहले होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि मानसून प्रभावित इलाकों में शुष्क और आर्द्र गर्मी का चरम एक-दूसरे से अलग समय पर आ सकता है। मध्य भारत जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक शुष्क गर्मी का मौसम अक्सर आर्द्र गर्मी के मौसम से लगभग एक महीने पहले आता है।
सिर्फ तापमान बढ़ना ही वजह नहीं
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह है कि केवल औसत तापमान में बढ़ोतरी से यह नहीं समझाया जा सकता कि गर्मी किस दिशा में और कितनी तेजी से मौसम की सीमाओं से बाहर जा रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बारिश और मिट्टी की नमी में लंबे समय के बदलाव, भूमि उपयोग में परिवर्तन, सिंचाई तथा प्राकृतिक जलवायु उतार-चढ़ाव भी इस बदलाव में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि शोधकर्ता यह दावा नहीं करते कि इन आंकड़ों से हर क्षेत्र में बदलाव का पूरा कारण निश्चित रूप से साबित हो गया है। इसके लिए आगे क्षेत्रीय अध्ययन और जलवायु मॉडल की जरूरत बताई गई है।
सेहत और व्यवस्था दोनों के लिए बढ़ेगा खतरा
गर्मी के मौसम के फैलने का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहेगा। वसंत में अचानक पड़ने वाली तेज गर्मी के समय लोगों का शरीर अभी गर्म मौसम के अनुकूल नहीं हुआ होता। वहीं लंबे गर्म मौसम के बाद शरद ऋतु में आने वाली गर्मी पहले से थके शरीर और बिजली, पानी तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और गर्मी से बचाव की व्यवस्थाएं केवल जून-जुलाई-अगस्त तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अधिक लंबे समय तक तैयार रखनी पड़ सकती हैं।
गर्मी का कैलेंडर बदल रहा
उल्लेखनीय है कि यह अध्ययन यह संकेत देता है कि गर्मी का कैलेंडर बदल रहा है। उत्तर-पश्चिम भारत जैसे क्षेत्रों में अब अप्रैल-मई से ही अत्यधिक गर्मी के खतरे को गंभीरता से देखना जरूरी हो सकता है। हालांकि “अप्रैल से अक्टूबर तक हर साल लू चलेगी” ऐसा निष्कर्ष इस अध्ययन से सीधे नहीं निकलता। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि अत्यधिक गर्मी के दिनों का मौसमी दायरा कई क्षेत्रों में पारंपरिक गर्मी की सीमा से बाहर फैल रहा है।
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