उम्मीदों के विपरीत हरियाणा में भाजपा के लगातार तीसरा दफा सरकार बनाने और 3 विधानसभा सत्र बीत जाने के करीब 10 महीने बाद कांग्रेस हाईकमान ने भूपेंद्र हुड्डा की बतौर नेता प्रतिपक्ष, तो वहीं जातीय और तमाम अन्य समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अबकी बार एससी समुदाय के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की करीब 2 दशक पुरानी परिपाटी को तोड़ते हुए ओबीसी समुदाय के नेता और पूर्व मंत्री राव नरेंद्र सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी के सभी धड़ों मुख्य रूप से भूपेंद्र हुड्डा गुट, कुमारी सैलजा व रणदीप सुरजेवाला गुट से समन्वय साधते हुए राव नरेंद्र की नियुक्ति की गई लेकिन पार्टी दिग्गजों के बीच जारी कलह को खत्म कर पाना नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए आसान नहीं होगा।
सभी धड़ों के साथ संतुलन बनाए रखने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा
हरियाणा में कुछ सालों में कांग्रेस पार्टी के इतिहास से स्पष्ट है कि प्रदेश अध्यक्ष को सभी धड़ों के साथ संतुलन बनाए रखने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और स्थिति ये रही है कि पार्टी हाईकमान भी प्रदेश कांग्रेस में सालों से जारी आपसी कलह को शांत नहीं कर पाया।
गौरतलब है कि पार्टी के 2 धड़ों में आपसी कलह के चलते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 37 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 48 सीटें जीतते हुए अकेले अपने दम पर सरकार बना ली। हर कार्य में कांग्रेस में पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा की एकतरफा चली और उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा गया। बाकी नेताओं को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। परिणामस्वरूप, हुड्डा विरोधी रणदीप सुरजेवाला और कुमारी सैलजा चुनाव प्रचार में कहीं फ्रंट पर नहीं दिखे। इसे कांग्रेस हाईकमान ने हरियाणा में हार का बड़ा कारण माना।
गुटबाजी का नतीजा यह रहा कि लगातार हरियाणा में तीसरी बार हार का सामना करना पड़ा
इस गुटबाजी के कारण संगठन कमजोर हुआ। दोनों गुटों की गुटबाजी का नतीजा यह रहा कि पार्टी को लगातार हरियाणा में तीसरी बार हार का सामना करना पड़ा। संगठन खड़ा करने को लेकर भी जमकर रस्साकशी हरियाणा में कांग्रेस ने 11 सालों के बाद संगठन खड़ा करते हुए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की लेकिन संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर कई दफा तत्कालीन प्रदेश अध्यक्षों और प्रभारियों में रस्साकशी देखने को मिली।
पूर्व में अशोक तंवर, कुमारी सैलजा तथा उदयभान (विधानसभा चुनाव से पहले) सहित 3 पूर्व और वर्तमान प्रदेश अध्यक्षों के साथ-साथ करीब आधा दर्जन तत्कालीन प्रदेश प्रभारी संगठनात्मक नियुक्तियां करने में विफल रहे थे। पिछले पार्टी प्रभारियों के प्रयासों के बावजूद नियुक्तियों के मामले में परिदृश्य अपरिवर्तित रहा क्योंकि सीनियर नेताओं के बीच आपसी कलह और आंतरिक संघर्ष जारी था जिससे पार्टी हाईकमान की परेशानी बढ़ी।
कुछ वर्षों में हरियाणा में कांग्रेस पार्टी ने राज्य प्रभारी की भूमिका के लिए कई नियुक्ति देखी
पार्टी नेताओं के बीच लंबे समय से चले आ रहे इन मतभेदों को दूर करने के चुनौतीपूर्ण कार्य के कारण हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद, पृथ्वीराज चव्हाण, कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद, विवेक बंसल और दीपक बाबरिया उपरोक्त दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। यह उल्लेख करना उचित है कि कुछ वर्षों में हरियाणा में कांग्रेस पार्टी ने राज्य प्रभारी की भूमिका के लिए कई नियुक्ति देखी हैं। गुलाम नबी आजाद ने जनवरी, 2019 में हरियाणा प्रभारी के रूप में कार्य किया। इसके बाद सितंबर, 2024 में विवेक बंसल और दिसंबर, 2022 में शक्ति सिंह गोहिल ने कार्यभार संभाला। अंतिम प्रभारी दीपक बाबरिया थे। उनसे पहले शकील अहमद और कमलनाथ ने भी क्रमश: 2015 और 2016 में पद संभाला था। 2016 के राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार आरके आनंद की हार पार्टी में अंदरुनी कलह के कारण हुई थी।
कांग्रेस ने पहली बार प्रदेश में अलग-अलग गुटों से 4 कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए थे
अगस्त, 2025 में पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हो पाई, जिसमें 32 जिलाध्यक्षों में से करीब दर्जन हुड्डा समर्थक बताए गए तो बाकी अन्य खेमों से रहे। ऐसे में पार्टी की तमाम गतिविधियों में हुड्डा और सैलजा गुट को साथ मिलाकर आगे बढ़ने में राव नरेंद्र को दिक्कत पेश आनी तय है।
पिछली बार संतुलन बनाए रखने के लिए कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए पिछली दफा हुड्डा के वफादार और उदयभान जो एससी समुदाय से हैं, को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने के अलावा सभी विरोधी गुटों के साथ-साथ जातिगत समीकरणों में संतुलन बनाने के लिए कांग्रेस ने पहली बार प्रदेश में अलग-अलग गुटों से 4 कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए थे। तत्कालीन कांग्रेस नेता किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी और सैलजा खेमे के रामकिशन गुर्जर के अलावा जितेंद्र भारद्वाज और सुरेश गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष बने। उदयभान 3 साल बाद तक भी संगठन नहीं बना पाए। उदयभान कहते रहे कि उन्होंने संगठन के लिए एक सूची तैयार कर तत्कालीन पार्टी प्रभारी दीपक बाबरिया को सौंपी थी।
राव नरेंद्र पर हुड्डा गुट का ठप्पा
प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए राव नरेंद्र के अलावा अहीरवाल बेल्ट से ओबीसी समुदाय से ही आने वाले व हुड्डा के करीबी राव दान सिंह और हुड्डा के विरोधी कैप्टन अजय यादव के बेटे राव चिरंजीव के भी नाम चल रहे थे। राजनीतिक गलियारों में सामान्यत: चर्चा है कि राव नरेंद्र बेशक कुछ समय से पार्टी के सभी गुटों के नेताओं से सामंजस्य बनाकर चल रहे थे लेकिन उनको हुड्डा गुट का नेता ही माना जाता है लेकिन कुमारी सैलजा व रणदीप सुरजेवाला गुट के साथ ही संतुलन बनाए रखने के मद्देनजर प्रदेश अध्यक्ष के पद पर उनकी ताजपोशी की गई है। गौरतलब है कि राव नरेंद्र 2009 में हरियाणा जनहित कांग्रेस (कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व वाली हजकां) के टिकट पर नारनौल से विधायक बने थे। बाद में कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद हुड्डा सरकार के दूसरे कार्यकाल साल 2009 से 2014 तक राव नरेंद्र पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे। ऐसे में आज भी उनको काफी हद तक हुड्डा का करीबी माना जाता है।
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