बढ़ती रासायनिक लागत, घटती मिट्टी की उर्वरता और जहरीले अनाज की चिंता के बीच अरड़ाना गांव के किसान मनीष शर्मा ने प्राकृतिक खेती की राह अपनाकर किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण जगा दी है। 8 साल पहले रसायनिक खाद और दवाई के बिना खेती शुरू करने वाले मनीष अब खेती का एक नया मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं। मनीष ने इस बार डेढ़ एकड़ में बासमती 1121 धान उगाई, जिसका उत्पादन 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ तक रहने का अनुमान है। वीरवार को करनाल मंडी में इसकी बिक्री 3,500 रुपए प्रति क्विंटल हुई। मनीष का कहना है कि प्राकृतिक खेती से उगाई फसल को जहरमुक्त होने की वजह से आम बाजार से दोगुना रेट मिल रहा है। उनका लक्ष्य है कि शुद्ध और पोष्टिक भोजन लोगों की थालियों तक पहुंचे।
प्राकृतिक खेती का सफर
चार भाइयों के परिवार में 12वीं पास मनीष के हिस्से में 2 एकड़ पुश्तैनी जमीन है। 8 साल पहले उन्होंने एक एकड़ में प्राकृतिक खेती शुरू की। पहले साल उत्पादन औसत से कम रहा, केवल 14 क्विंटल प्रति एकड़। लेकिन हार नहीं मानी और खेत में देसी खाद बनाना शुरू किया। गाय का गोबर, मूत्र, बेसन और गुड़ मिलाकर तैयार की गई खाद ने मिट्टी की ताकत बढ़ाई और उत्पादन अब 18–20 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया।
रासायनिक खाद और दवाइयों से तौबा
मनीष रसायनिक खाद या दवाइयों का प्रयोग नहीं करते। उनका कहना है कि रासायनिक दवाइयों से मिट्टी की उर्वरता घटती है और भोजन में जहर घुल जाता है। देसी खाद से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हुई और उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है। बाजार में पहचान: प्राकृतिक खेती के उत्पाद फिलहाल चुनिंदा लोगों तक ही पहुँचते हैं। मनीष सोशल मीडिया के माध्यम से सीधे ग्राहकों से संपर्क कर रहे हैं, जिससे धीरे-धीरे मार्केट डिमांड बढ़ रही है और अन्य किसान भी इस खेती को अपनाने में दिलचस्पी ले रहे हैं।
चिंतन के साथ कर्म जरूरी
मनीष का मानना है कि केवल चिंतन से नहीं, कर्म से बदलाव आता है। अगर आज किसान प्राकृतिक खेती की ओर नहीं लौटेंगे, तो आने वाले वर्षों में भोजन की गुणवत्ता और सेहत दोनों प्रभावित होंगी। उनका अनुभव बताता है कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी, फसल और सेहत तीनों बचाए जा सकते हैं।
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