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The Haryana Story | मिथक से सजगता तक : महाशिवरात्रि उत्सव का वास्तविक अर्थ : गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

मिथक से सजगता तक : महाशिवरात्रि उत्सव का वास्तविक अर्थ : गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

किसी ने मुझसे पूछा, ‘शिव कौन हैं?’ मैंने प्रत्युत्तर में पूछा, ‘क्या ऐसा है जो शिव नहीं है?’ क्या शिव कोई ‘व्यक्ति’ हैं? क्या वे कोई रूप हैं? क्या वे कहीं ऊपर बैठे हैं? नहीं...ये सब मिथक हैं।

किसी ने मुझसे पूछा, ‘शिव कौन हैं?’ मैंने प्रत्युत्तर में पूछा, ‘क्या ऐसा है जो शिव नहीं है?’ क्या शिव कोई ‘व्यक्ति’ हैं? क्या वे कोई रूप हैं? क्या वे कहीं ऊपर बैठे हैं? नहीं। ये सब मिथक हैं। एक मिथक यह है कि शिव हजारों वर्ष पूर्व इस पृथ्वी पर निवास करने वाले एक योगी थे। शिव का कोई शरीर नहीं है; वे कभी कोई व्यक्ति नहीं थे। अगम्य, अनंत दिव्यता को प्रतीकात्मक रूप में समझाने के लिए प्राचीन ऋषियों ने एक स्वरूप की रचना की। वास्तव में शिव का कोई आकार नहीं है; वे न कभी जन्मे, न उनके कोई गुण-धर्म हैं। वे तो केवल चेतना का आंतरिक आकाश हैं।

वे संपूर्ण सृष्टि का परम मंगल स्वरूप

शिव एक सिद्धांत (तत्त्व) हैं, जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है, जिसमें सब कुछ स्थित है और जिसमें अंततः सब कुछ विलीन हो जाता है। वे वही आकाश और चेतना हैं, जिनसे आप कभी बाहर नहीं जा सकते, क्योंकि वे संपूर्ण सृष्टि का परम मंगल स्वरूप हैं। उनके शरीर का वर्णन नीले रंग में किया गया है, क्योंकि नीला रंग आकाश का प्रतीक है—सर्वव्यापी, असीम, निराकार। कैलाश भी मात्र वह पर्वत नहीं है जहाँ शिव निवास करते थे; ‘कैलाश’ का अर्थ है—जहाँ केवल उत्सव और आनंद हो। जब आपके भीतर शिव तत्त्व का उदय होता है, तब जीवन स्वयं एक उत्सव बन जाता है—वही कैलाश है। 

शिव के पांच मुख का मिथक

वास्तव में शिव का कोई मुख नहीं है, फिर भी वे पाँच तत्वों—अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश—के माध्यम से पाँच आयामों में प्रकट होते हैं। प्रत्येक तत्व के अधिष्ठाता का एक सुंदर नाम है। सद्योजात—जो प्रत्येक क्षण जन्म लेता है; ताज़ा, जीवंत और नवीन। वामदेव—सौंदर्य और कोमलता का प्रतीक। अघोर—जहां भय का कोई स्थान नहीं; अद्भुत और विस्मयकारी सौंदर्य का स्वरूप। शिव को विरूपाक्ष भी कहा गया है—अर्थात् ‘बिना आँखों के भी देखने वाला’। जब आप आँखें बंद करते हैं, तब भी आप बिना इंद्रियों के कुछ जान और देख सकते हैं; चेतना का वही आयाम विरूपाक्ष है। वे तत्पुरुष हैं—वह चेतना जो इस ‘पुर’ अर्थात् शरीर-नगर में निवास करती है। हमारा शरीर एक सुव्यवस्थित नगर की भाँति है—आपूर्ति की नाड़ियाँ, कोशिकाओं की गतिविधियाँ, एक अद्भुत संरचना। इस ‘पुर’ में जो निवास करता है, वहीं पुरुष है।

महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ है—आंतरिक जागरण

महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का मिथक प्राचीन समय में लोग यह अनुभव करने के लिए जागते थे कि क्या वे नींद पर विजय पा सकते हैं। किंतु बाहरी जागरण तो केवल आरंभ है। महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ है—आंतरिक जागरण। आज स्थिति विपरीत हो गई है। लोग यह सोचकर जागते रहते हैं कि सोना नहीं चाहिए, और पूरी रात फ़िल्में देखते या चिंताओं में डूबे रहते हैं। किंतु जब आप शिव तत्त्व में डूबते हैं, तो चेतना भीतर से जागृत होती है। पूर्वकाल में ये विधियाँ प्रकृति के अनुरूप थीं। किसान इस समय जागते थे क्योंकि न तो बुवाई होती थी, न कटाई। आज हमारा शरीर इतना सक्षम नहीं कि पूरी रात जागकर अगले दिन सामान्य रूप से कार्य कर सके।

आप अपने भीतर की आत्म-ज्योति के प्रति जागते रहें

सच्ची शिवरात्रि किसी भी दिन हो सकती है— आप अपने भीतर की आत्म-ज्योति के प्रति जागते रहें। यही वास्तविक जागरण है—जब शरीर-नगर में निवास करने वाली चेतना खिल उठती है और अपने अनंत स्वरूप को पहचान लेती है। शिवरात्रि का अर्थ है—दिव्य चेतना की शरण में जाना, शिव तत्त्व में विश्राम करना। 15 फरवरी 2026 को आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित महाशिवरात्रि समारोह में ध्यान और भक्ति के एक अद्वितीय, गहन अनुभव के सहभागी बनें।

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