करनाल की रहने वाली प्राइवेट स्कूल की अध्यापिका अनु मदान आज करनाल में किसी परिचय की मोहताज नहीं है। जब ढेर सारे बुजुर्गों की सेवा करने की बात आती है तो पंक्ति में सबसे आगे खड़ी हुई अनु मदान मिलती है। समाजसेवी का अनु मदान जहां स्कूल में बच्चों को शिक्षा देकर उनका भविष्य सुधार रही है तो वहीं निस्वार्थ भाव से बुजुर्गों की सेवा करके पुण्य की भागीदारी बन रही है। स्कूल से अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद वह रात तक अपना आशियाना वृद्ध आश्रम में बुजुर्गों की सेवा में अपने आप को समर्पित कर रही है। यह एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है। अनु मदान जैसी हस्तियां समाज के लिए एक मिसाल की तरह हैं, जो निस्वार्थ सेवा की परिभाषा को चरितार्थ कर रही हैं।
ममता की प्रतिमूर्ति है अनु मदान
अनु मदान जिन्होंने बेसहारा बुजुर्गों की सेवा में अपने जीवन को समर्पित किया है। उन्होंने बताया कि शिक्षा का अर्थ केवल किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है। करनाल की एक प्राइवेट स्कूल टीचर अनु मदान इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं। दिन में बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने वाली अनु, स्कूल की घंटी बजते ही एक अलग ही मिशन पर निकल पड़ती हैं और उन बुजुर्गों की सेवा करने, जिन्हें अपनों ने ही भुला दिया है।
15 साल पहले लिया अटूट संकल्प
उन्होंने बताया कि वह पिछले 15 वर्षों से अपना आशियाना' वृद्ध आश्रम से जुड़ी हुई हैं। उनके लिए यह केवल एक समाज सेवा नहीं, बल्कि उनके जीवन का उद्देश्य बन चुका है। स्कूल की छुट्टी के बाद जहाँ लोग आराम की तलाश करते हैं, वहीं अनु सीधा आश्रम पहुँचती हैं और देर रात तक बुजुर्गों की सेवा में जुटी रहती हैं।
600 बुजुर्गों को कर चुकी रेस्क्यू, ढाई सौ से ज्यादा को उनके परिवार से मिल चुकी अनु
अनु मदान की मेहनत और करुणा ने सैकड़ों जिंदगियों को बदला है। उन्होंने बताया कि वह अपने 15 - 16 साल के अंदर 600 बेसरा लोगों को रेस्क्यू कर चुकी है। उनके परिवार ने भुला दिया था। वह अब तक करीब 250 बिछड़े हुए बुजुर्गों को उनके परिवार से मिलवाकर उनके घर की खुशियाँ लौटा चुकी हैं। लावारिस और चलने-फिरने में असमर्थ करीब 600 बुजुर्गों को वे रेस्क्यू कर आश्रम लेकर आई हैं।
पिछले 40 वर्षों से समाज को समर्पित है अपना आशियाना
आश्रम उन्होंने बताया कि अपना आशियाना आश्रम सिर्फ एक संस्था नहीं एक वह घर है जहां ऐसे लोगों को रेस्क्यू करके लाया जाता है जिनको उनके परिवार के द्वारा छोड़ दिया जाता है। आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के खाने-पीने से लेकर उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का वे खुद ध्यान रखती हैं।
एक हादसे से हुई सेवा समर्पण की शुरुआत
उन्होंने बताया कि जब उन्होंने इसकी शुरुआत की तब कुछ ऐसा हुआ कि एक बुजुर्ग जिसके शरीर पर चोट लगने के बाद गहरे घाव को गए थे। उनके शरीर में घाव में कीड़े चल रहे थे और मवाद भी काफी हो रखा था। जब उन्होंने उसकी हालत को देखा तो उन्होंने उसको वहां से उठकर अपना आशियाना आश्रम में लाया गया और वहीं से अपना आशियाना आश्रम से उनका जुड़ाव शुरू हुआ। उसे बुजुर्ग ने उनको बताया कि उनको उनके परिवार के द्वारा छोड़ दिया गया है और वह मंदिर के आगे भीख मांग कर ही अपने दो व्यक्ति रोटी का जुगाड़ करते हैं तब से उनके मन में करुणा का भाव जाग गया और उन्होंने बुजुर्गों की सेवा करना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझा।
पिता ने बेटों की तरह पाला
उन्होंने बताया कि उनको संस्कार उनके परिवार से मिलते हैं पहले संगठित परिवार होते थे तो संस्कार भी ज्यादा होते थे आजकल के बच्चों में संस्कार बहुत कम रह गए हैं जिसके चलते बुजुर्ग अब बेसहारा होते जा रहे हैं उन्होंने कहा कि उनकी परवरिश उनके पिता ने एक लड़की की तरह नहीं एक लड़के की तरह यानी बेटे की तरह की है। जब वह है पंजाबी विश्वविद्यालय की विद्यार्थी थी तब वह काफी होना हर थी खेलों में भी वह काफी अच्छी थी और उनको इस प्रकार के संस्कार उनके पिता और परिवार से मिले।
समाज को दी एक नई दिशा
उन्होंने बताया कि जो मां-बाप अपने पांच-पांच बच्चों को पाल-पोष कर काबिल बनते हैं उन पांच बच्चों से अपने दो माता-पिता की भी देखभाल नहीं हो रही। अक्सर समाज में बुजुर्गों को बोझ समझकर सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। ऐसे असहाय लोगों के लिए अनु मदान किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं। वे न केवल उन्हें छत और भोजन देती हैं, बल्कि उन्हें वह सम्मान और प्रेम भी देती हैं जिसकी कमी उन्हें सबसे ज्यादा खलती है।
अनु मदान का जीवन हमें सिखाता है कि व्यस्त दिनचर्या के बावजूद, यदि मन में सेवा का भाव हो, तो वक्त की कमी कभी आड़े नहीं आती। एक शिक्षिका के रूप में वे बच्चों को अक्षर ज्ञान दे रही हैं और एक सेविका के रूप में पूरी मानवता को इंसानियत का पाठ पढ़ा रही हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता एक बार मिलते हैं अपने माता-पिता का सम्मान करें उनकी देखभाल करें अगर वह हमारे पास से चले जाए तो वह कभी दोबारा लौटकर नहीं आएंगे इसलिए वह सभी से अपील करती है कि अपने बुजुर्गों को की देखभाल करें और उनके प्रेम करें ताकि वह बुढ़ापे में अपने आप को अकेला महसूस ना करें।
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