हरियाणा के पानीपत जिले के गांव नौल्था में 900 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा के तहत ऐतिहासिक डाट होली (फाग) का भव्य आयोजन किया गया। ग्रामीणों ने कई दिनों से सूखे रंगों, कढ़ाहा में उबलते रंग और भारी जोश के साथ इसकी तैयारी की थी, जिसमें "बाबा लाठे वाले" की परंपरा के अनुसार आपसी भाईचारे के साथ यह अनूठा उत्सव मनाया गया। गांव में कई दिनों से सुखी डाट लगा कर फाग की तैयारी की। पहले दिन फाग कमेटी द्वारा लोगों को फाग के लिए जागरूक किया।
बड़े-बड़े कढ़ाईयों में रंग को गर्म किया जाता
डुमरान सरपंच प्रतिनिधि नीरज शर्मा ने बताया 909 वर्ष पहले लोग राजस्थान से आकर नौल्था में बसे थे जो मथुरा का फाग देखने के लिए गए और वहां की परंपरा से प्रभावित होकर ग्रामीणों ने अगले साल से गांव में डाट लगाकर फाग की शुरुआत की। हालांकि कई बार विकट परिस्थितियों भी आई एक बार अंग्रेजों ने इसमें विघ्न डालने का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो पाए और ग्रामीणों ने तत्कालीन कप्तान को वैशाख के महीने में फाग का त्यौहार दिखाया, जिससे प्रसन्न होकर कप्तान ने फाग के लिए इजाजत दे दी थी। उन्होंने बताया कि हमारे गांव में फाग बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । गांव की हर चौपाल में बड़े-बड़े कढ़ाईयों में रंग को गर्म किया जाता है और टोलियां पर चौपाल के ऊपर से उन पर रंग फेंका जाता है।
दीवार के सहारे खड़े होकर जोर आजमाइश की जाती
करीब 909 साल पहले बाबा लाठे वाले ने मथुरा के फालन गांव से प्रेरित होकर इस अनोखी डाट होली की शुरुआत की थी। इसमें गांव की चौपालों पर कढ़ाहा में रंग उबालकर एक-दूसरे पर डाला जाता है। दीवार के सहारे खड़े होकर जोर आजमाइश की जाती है और छतों से रंग-पानी बरसाया जाता है। एक डाट ऐसी होती है, जिसमें युवा सिर से सिर जोड़कर बैठ जाते हैं और ऊपर से पानी फेंका जाता है, लेकिन वे पीछे नहीं हटते। 1942 में अंग्रेजों ने इस आयोजन पर रोक लगा दी थी, लेकिन ग्रामीण अपनी परंपरा बचाने के लिए अड़ गए थे। इस उत्सव में पूरा गांव और आसपास के क्षेत्र के लोग शामिल होते हैं, जो सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।
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