मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और अस्थिरता का सीधा असर अब हरियाणा के राइस मिलर्स और बासमती निर्यातकों पर दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट बाधित होने और रसद लागत में भारी उछाल के कारण करोड़ों का कारोबार अधर में लटक गया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण लाल सागर (Red Sea) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं। निर्यातकों के अनुसार, जो जहाज 28 फरवरी (युद्ध की तीव्रता से पहले) निकले थे, वे अब तक अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सके हैं। कई जहाजों को रूट बदलना पड़ा है, जिससे माल पहुंचने में देरी हो रही है। करनाल, जो बासमती चावल के लिए विश्व भर में पहचान रखता है, इस संकट का सीधा असर झेल रहा है। हरियाणा प्रदेश 40% चावल विदेश में निर्यात करता है और खाड़ी के कई देशों में भी वह निर्यात करता है। लेकिन ईरान इजरायल और अमेरिका के युद्ध के बीच अब चावल के व्यापार पर संकट मंडरा रहा है।
लागत में 30% तक का उछाल
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब भारत के बासमती चावल कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट बाधित होने से निर्यात धीमा पड़ा है, वहीं कंटेनर और परिवहन लागत में 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है।शिपिंग रूट में बदलाव और जोखिम बढ़ने के कारण कंटेनर चार्ज, ग्राउंड रेंट और परिवहन लागत में 25 से 30 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। इससे न केवल पुराना मुनाफा कम हुआ है, बल्कि नए सौदे करना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
हरियाणा का 40% निर्यात दांव पर
भारत के कुल बासमती निर्यात में हरियाणा की हिस्सेदारी लगभग 40% है। राइस मिलर दिनेश गुप्ता के अनुसार, भारत से होने वाले कुल बासमती निर्यात का 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले खाड़ी देशों (Gulf Countries) में जाता है। युद्ध के कारण ईरान जैसे प्रमुख खरीदार देशों के साथ व्यापारिक संतुलन बिगड़ गया है। व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता फंसे हुए भुगतान (Payment) को लेकर है। अंतरराष्ट्रीय पोर्ट्स पर कंटेनर रुकने से न केवल डिलीवरी लेट हुई है, बल्कि विदेशी खरीदारों ने पुरानी पेमेंट भी रोक दी है। बाजार में अनिश्चितता के कारण नए ऑर्डर मिलने की रफ्तार भी काफी धीमी पड़ गई है।
स्थानीय मंडियों पर असर
निर्यात रुकने या धीमा होने का सीधा असर करनाल और आसपास की मंडियों में चावल की कीमतों पर पड़ सकता है। यदि निर्यातकों के पास स्टॉक जमा होता रहा, तो आने वाले समय में स्थानीय स्तर पर कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है, जिसका असर किसानों की आय पर भी पड़ना तय है। गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट का यह संकट केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि भारत के कृषि-अर्थतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि जल्द ही स्थितियां सामान्य नहीं हुईं, तो बासमती उद्योग को लंबे समय तक आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
नए ऑर्डर मिलने की रफ्तार भी हुई धीमी
राइस मिलर एवं निर्यातक दिनेश गुप्ता के अनुसार, मिडिल ईस्ट क्षेत्र में तनाव के कारण शिपिंग सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई जहाज अपने तय रूट से भटक गए हैं और कुछ कंटेनर बीच रास्ते के पोर्ट्स पर ही रोक दिए गए हैं। इससे कंटेनर चार्ज, ग्राउंड रेंट और शिपिंग रेट में भारी इजाफा हुआ है। उन्होंने बताया कि भारत से बासमती चावल 70 प्रतिशत बासमती चावल खाड़ी देशों में जाता है । जो शिप 28 फरवरी से यानी युद्ध शुरू होने से पहले अपने रूट पर चले थे वह अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाए हैं। नए ऑर्डर मिलने की रफ्तार भी धीमी हो गई है, जबकि पहले के ऑर्डर की पेमेंट भी अटकी हुई है।
राइस मिलर एवं निर्यातक दिनेश गुप्ता
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