पानीपत की फिजाओं में जब सावन की फुहारें घुलती हैं, तो आस्था का एक ऐसा सैलाब उमड़ता है, जिसकी जड़ें एक सदी से भी अधिक पुरानी हैं। यह कहानी केवल एक यात्रा की नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे उस अटूट विश्वास की है, जिसे 'मुल्तान सावन जोत' के नाम से जाना जाता है।
112 वर्षों का पुण्य प्रताप
इस पावन परंपरा का इतिहास 112 वर्ष पुराना है। वर्ष 1911 में पाकिस्तान के मुल्तान जिले के निवासी लाला रूपचंद ने एक असाधारण संकल्प लिया था। उन दिनों मुल्तान और उसके आसपास की नदियाँ अक्सर अपना रौद्र रूप दिखाती थीं। बाढ़ और उफान से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता था, और न जाने कितने निर्दोष लोग काल के गाल में समा जाते थे। कहा जाता है कि किसी संत या ज्ञानी के परामर्श पर लाला रूपचंद ने मां गंगा की शरण लेने का निर्णय लिया। वे पैदल ही मुल्तान से हरिद्वार तक की लंबी और कठिन यात्रा पर निकले, ताकि मां गंगा के चरणों में 'सावन जोत' अर्पित कर जन-कल्याण की प्रार्थना कर सकें। उनकी श्रद्धा ऐसी थी कि उस ज्योत के प्रवाह के साथ ही लोगों के कष्टों के निवारण की कामना जुड़ गई।
परंपरा का पुनरुद्धार, पानीपत का संकल्प
समय बदला, विभाजन की त्रासदी ने अपनों को अपनों से दूर कर दिया, लेकिन संस्कारों की लौ नहीं बुझी। वर्ष 2018 में, पानीपत के मॉडल टाउन स्थित मुल्तान भवन में मुल्तान समाज के प्रबुद्धजनों और गणमान्य लोगों की एक बैठक हुई। इस बैठक में निर्णय लिया गया कि लाला रूपचंद द्वारा शुरू की गई इस महान परंपरा को लुप्त नहीं होने दिया जाएगा। मुल्तान समाज व मॉडल टाउन क्षेत्र के सभी मंदिर के पदाधिकारियों सर्वसम्मति से इस गौरवशाली परंपरा को पुनः जीवंत करने का संकल्प लिया। प्रधान विपिन चुघ के कुशल मार्गदर्शन में, बीते आठ वर्षों से यह ज्योत यात्रा निरंतर और भव्य रूप से निकाली जा रही है।
नाव का आकार, प्रतीक है 'जीवन नैया' का
इस यात्रा का सबसे भावुक पहलू है, नाव के आकार में निर्मित भव्य जोत। यह ज्योत केवल प्रकाश का पुंज नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि जब-जब मानवता पर संकट आता है, तब-तब ईश्वर की कृपा एक नाव बनकर हमें उस संकट के सागर से पार ले जाती है। प्रधान विपिन चुघ बताते हैं कि यह यात्रा व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समष्टि के लिए है। इस ज्योत के साथ शहरवासियों की खुशहाली, निरोगी काया और सुख-समृद्धि की मंगल कामना की जाती है। यह उन कष्टों को याद करने का दिन है जिनसे मुल्तान के लोग कभी जूझते थे, और यह उस कृतज्ञता को प्रकट करने का दिन है, जो मां गंगा की कृपा के प्रति समर्पित है।
आस्था की अविरल धारा
आज जब यह ज्योत पानीपत की गलियों से गुजरती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास स्वयं चलकर आया हो। यह यात्रा उन लोगों के त्याग का सम्मान है जिन्होंने कठिन समय में धर्म और मानवता का मार्ग चुना। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज के उस जुड़ाव का प्रमाण है जो आज भी अपने पूर्वजों की विरासत को संजोए हुए है। सावन की रिमझिम के बीच, जब यह जोत आगे बढ़ती है, तो शहर के कोने-कोने से निकलती श्रद्धा भरी आंखें और हाथ जोड़ते भक्त यही प्रार्थना करते हैं कि जैसे मां गंगा ने उस काल में लोगों के कष्ट हरे थे, वैसे ही यह ज्योत आज भी सबके जीवन में सुख और शांति का प्रकाश भरती रहे।सभी बिरादरी के लोग मुल्तान सावन जोत में साथ रहते हैं।
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